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गुवाहाटी में हनुमान जन्मोत्सव: स्मृतियों से वर्तमान तक

प्रमोद तिवाड़ी

गुवाहाटी के धार्मिक कैलेंडर में हनुमान जन्मोत्सव का विशेष स्थान रहा है। यह केवल एक पर्व नहीं था, बल्कि महानगर की सामूहिक आस्था का उत्सव हुआ करता था। गल्ला पट्टी स्थित हनुमान मंदिर से निकलने वाली शोभायात्रा का लोगों को पूरे वर्ष इंतजार रहता था। ऐसा लगता था मानो पूरा शहर उस एक दिन के लिए स्वयं को तैयार कर रहा हो।

महोत्सव से एक पखवाड़े पहले ही श्री गौहाटी गौशाला के प्रांगण में झांकियों का निर्माण व अन्य तैयारियां शुरू हो जाती थी । चर्चा आम रहती थी कि इस बार समिति क्या नया प्रयोग करेगी। तैयारी केवल आयोजकों तक सीमित नहीं रहती थी। समाज के साधारण लोग भी गौशाला पहुंचकर श्रमदान करते थे। यह वही भाव था, जैसे रामसेतु निर्माण में गिलहरी ने अपने नन्हे शरीर से रेत ढोकर प्रभु कार्य में सहभागिता की थी। योगदान छोटा था, पर भावना विराट थी। आयोजन के लिए चंदा संग्रह में भी यही भावना काम करती थी I आयोजक दर-दर, दुकान – दुकान जाकर लोगों से राशि एकत्रित करते थे I लोगबाग भी स्वेच्छा से यथाशक्ति, यथाभक्ति आर्थिक योगदान थे I इस तरीके से ज्यादा से ज्यादा लोग खुद ब खुद आयोजन का हिस्सा बन जाते थे I

जिस दिन शोभायात्रा निकलती, उस दिन गल्ला पट्टी और आसपास के क्षेत्रों में व्यापारिक प्रतिष्ठान स्वतः बंद रहते। कामरूप चैंबर ऑफ़ कॉमर्स बाकायदा अपील करता कि व्यापारी इस दिन दुकानें बंद रखें। हनुमान मंदिर परिसर उत्सव स्थल में बदल जाता। दूर-दूर से श्रद्धालु शोभायात्रा देखने आते। मार्ग में हजारों लोग जुड़ते चले जाते। ऐसा लगता मानो पूरा शहर एक साथ “जय श्री राम” और “जय बजरंगबली” का उद्घोष कर रहा हो।

उन दिनों जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में होने वाले रात्रि जागरण की भी अपनी अलग पहचान थी। बाहर से आने वाले भजन गायकों की चर्चा कई दिनों पहले शुरू हो जाती थी। गल्ला पट्टी हनुमान मंदिर के बाहर देर रात तक भीड़ लगी रहती। इस मौक़े पर समाज की महिलाओं की भागीदारी विशेष रूप से उल्लेखनीय होती थी। वे परिवार सहित घंटों बैठकर भजनों का रसपान करती थीं। घंटियों की ध्वनि और भजनों की लय में रात कब बीत जाती, इसका पता ही नहीं चलता था।

समय बदला और उत्सव का स्वरूप भी बदलता चला गया। पिछले कुछ वर्षों में हनुमान जयंती एक धार्मिक आयोजन से अधिक एक इवेंट जैसी होने लगी। आम लोगों की सहभागिता धीरे-धीरे कम होती गई। शोभायात्रा को लेकर वह उत्साह नहीं रहा। रात्रि जागरण भी आकर्षण खोने लगा। महंगे भजन गायकों को बुलाया गया, बड़े-बड़े पंडाल लगे, पर श्रद्धालु नहीं आए। पंडालों में गिने-चुने लोग रह गए। भजन-कीर्तन के पुराने रसिकों ने कार्यक्रमों से दूरी बना ली। यह स्थिति लगभग एक दशक से बनी हुई है।

इसमें प्रशासनिक प्रतिबंधों ने भी अपनी भूमिका निभाई। पिछले दो वर्षों से महानगर में किसी भी प्रकार के जुलूस – जलसों पर रोक लगी हुई है। ऐसे में अब परंपरागत ढंग से जन्मोत्सव मनाने पर ही प्रश्न खड़े हो गए हैं। श्रद्धालु चाहते हैं कि हनुमान जन्मोत्सव के नाम पर कुछ नया हो, कुछ ऐसा जो नियमों के भीतर भी हो और समाज को जोड़ने वाला भी।

नगांव, बोकाखात, तिनसुकिया जैसे शहरों के मॉडल सामने हैं। वहां हनुमान जन्मोत्सव केवल समिति का कार्यक्रम नहीं, बल्कि पूरे समाज का उत्सव होता है। भक्ति वहां मंच पर नहीं, जन-जीवन में दिखाई देती है। ऐसा ही कुछ करने की अपेक्षा हनुमान भक्त गुवाहाटी के आयोजकों से रखते हैं I

सालासर बालाजी की भूमि से देशांतर कर आए मारवाड़ियों के इष्ट देवता हैं हनुमान जी । गुवाहाटी की सामाजिक संरचना में भी उनकी विशेष भूमिका रही है। इसलिए चाह यही है कि यहां हनुमान जन्मोत्सव राजनीति, दिखावे और प्रतिस्पर्धा से ऊपर उठकर भक्ति भाव से मनाया जाए। हनुमान वही हैं, जो सेवा के प्रतीक हैं, जो निष्काम कर्म का आदर्श हैं, जो शक्ति के साथ विनम्रता का संदेश देते हैं।

अब दृष्टि लब्ध प्रतिष्ठित समाजसेवी प्रकाश गोयनका के नेतृत्व में आज गठित हुई हनुमान जन्मोत्सव समिति की नई टीम पर है। देखने योग्य बात यह होगी कि यह टीम जनता की नब्ज को कितना समझ पाती है। लोग मंच नहीं, सहभागिता चाहते हैं। लोग भव्यता नहीं, भाव चाहते हैं। यदि आयोजन में सेवा को केंद्र में रखा गया, यदि समाज को केवल दर्शक नहीं, सहभागी बनाया गया, तो संभव है कि गुवाहाटी में हनुमान जन्मोत्सव फिर से वही बन जाए, जो कभी था—आस्था का उत्सव, स्मृतियों की विरासत और सामूहिक भक्ति का जीवंत स्वरूप।

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