बंगाल में कांटों का ताज: भारी कर्ज के बीच सरकार को खोलना होगा सातवें वेतन आयोग के लिए खजाना, समझें चुनौतियां

थर्ड आई न्यूज

कोलकाता I पश्चिम बंगाल में 15 साल बाद ऐतिहासिक सत्ता परिवर्तन तो हो गया है, लेकिन नई सरकार के लिए यह जीत किसी मखमली सेज नहीं बल्कि कांटों के ताज जैसा है। 20 लाख करोड़ रुपये से बड़ी अर्थव्यवस्था वाले इस राज्य का सरकारी खजाना फिलहाल गहरे दबाव में है। सातवें वेतन आयोग का भारी-भरकम वादा, खाली तिजोरी और ‘अन्नपूर्णा भंडार’ जैसी लोकलुभावन योजनाएं राज्य के वित्तीय स्वास्थ्य की अंतिम परीक्षा लेने वाली हैं। आइए, आसान सवाल-जवाब में समझते हैं कि बंगाल के आर्थिक हालात क्या हैं और नई सरकार के सामने कितनी बड़ी चुनौतियां मुंह बाए खड़ी हैं।

सवाल: सरकारी खजाने की वर्तमान हालत क्या है?
जवाब: बंगाल की आर्थिक स्थिति बेहद खराब दौर से गुजर रही है। 16वें वित्त आयोग के मूल्यांकन के अनुसार, राज्य का ‘कर्ज-GSDP अनुपात’ (Debt-to-GSDP ratio) करीब 37% के खतरनाक स्तर पर बना हुआ है। राज्य सरकार की कुल कमाई का लगभग तीन गुना हिस्सा कर्ज के बोझ तले दबा है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि सरकार की कुल कमाई का एक बहुत बड़ा हिस्सा सिर्फ कर्मचारियों के वेतन, पेंशन और पुराने कर्जों का ब्याज चुकाने में ही खर्च हो जाता है। राज्य सरकार पुरानी पेंशन योजना चला रही है जिससे आगे चलकर खजाने पर देनदारी और बढ़ेगी।

सवाल: भाजपा ने सातवें वेतन आयोग का वादा किया है, इसका खजाने पर कितना असर पड़ेगा?
जवाब: भाजपा ने नई सरकार बनने के 45 दिनों के भीतर सातवां वेतन आयोग लागू करने का वादा किया है । वर्तमान में राज्य सरकार छठे वेतन आयोग (ROPA 2019) के ढांचे पर चल रही है और राज्य व केंद्र के कर्मचारियों व पेंशनरों के महंगाई भत्ते व महंगाई राहत (डीए-डीआर) के बीच 36% से 40% तक की भारी खाई है । सातवें वेतन आयोग को पूरी तरह लागू करने और सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार पुराने डीए-डीआर बकाये को चुकाने का मतलब है कि राज्य के खजाने पर हर साल हजारों करोड़ रुपये (अनुमानित 20,000 से 25,000 करोड़ रुपये) का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा । यह नई सरकार के लिए एक बड़ा वित्तीय झटका साबित होगा। शुभेंदु सरकार इससे कैसे निपटती है यह देखने वाली बात होगी।

सवाल: लक्खी भंडार से अन्नपूर्णा भंडार का सफर सरकारी खजाने को कैसे प्रभावित करेगा?
जवाब: पश्चिम बंगाल की पिछली ममता सरकार की ‘लक्खी भंडार’ योजना के तहत 2.21 करोड़ से ज्यादा महिलाओं को हर महीने आर्थिक मदद दी जा रही थी, जिस पर राज्य का सालाना बजट 26,700 करोड़ रुपये था। भाजपा ने अपने चुनावी वादे में इसे बढ़ाकर ‘अन्नपूर्णा भंडार’ का रूप देने का वादा किया है। योजना की नकद राशि को दोगुना करने का सीधा सा अर्थ है कि नई सरकार को हर साल 50,000 करोड़ रुपये से अधिक सिर्फ इस अकेली योजना के लिए जुटाने होंगे । विकास कार्यों के बजट को काटे बिना इतना पैसा जुटाना वित्तीय रूप से लगभग असंभव है।

सवाल: आयुष्मान भारत और मनरेगा जैसी केंद्रीय योजनाओं को लागू करने में क्या अड़चनें हैं?
जवाब: केंद्र और राज्य की योजनाओं का टकराव एक बड़ी चुनौती है। राज्य की स्वास्थ्य साथी योजना लगभग 1.5 करोड़ परिवारों को कवर देती है, जबकि केंद्र की ‘आयुष्मान भारत’ 2011 की सामाजिक और आर्थिक जनगणना के आंकड़ों के आधार पर लक्षित है, जिसमें राज्य के केवल 1.12 करोड़ परिवार आते हैं। विलय की स्थिति में 38 लाख परिवारों को बाहर होने से बचाने के लिए एक ‘हाइब्रिड मॉडल’ अपनाना होगा। इसके अलावा, भ्रष्टाचार और फर्जी जॉब कार्ड्स के कारण मनरेगा और PMAY-G (आवास योजना) का केंद्रीय फंड रुका हुआ है। इसे दोबारा शुरू करने के लिए आधार लिंकिंग, जियो-टैगिंग और पारदर्शी कार्रवाई रिपोर्ट (ATR) की आवश्यकता है। भ्रष्टाचार के व्यापक आरोपों, फर्जी जॉब कार्ड और योजनाओं का नाम बदलने (जैसे पीएम आवास को ‘बांग्ला आवास योजना’ करना) के कारण केंद्र सरकार ने 2022 से मनरेगा और पीएम आवास योजना (PMAY-G) का फंड पूरी तरह से रोक रखा था। हालांकि अब हाल ही में केंद्र सरकार ने मनरेगा की जगह एक नया सख्त कानून ‘विकसित भारत-ग्राम’ (VB-G RAM G) लागू कर दिया है। राहत की बात सिर्फ जल जीवन मिशन में है, जहां राज्य में 81.87% ग्रामीण घरों में नल का पानी पहुंच चुका है।

सवाल: भाजपा सरकार के लिए इन योजनाओं को जमीन पर उतारना कितनी बड़ी चुनौती है?
जवाब: योजनाओं का पैसा पास करना एक बात है, लेकिन उन्हें धरातल पर उतारना सबसे बड़ी चुनौती है। इसके दो मुख्य कारण हैं:

सिंडिकेट राज: राज्य में निर्माण कार्यों (ईंट, सीमेंट, बालू) से लेकर टेंडर तक में अवैध कमीशन वसूलने वाले ‘सिंडिकेट्स’ का गहरा जाल है। इस संगठित ‘कट मनी’ रैकेट को खत्म किए बिना कोई भी बुनियादी ढांचे का प्रोजेक्ट सफल नहीं हो सकता।

पंचायत-स्तरीय टकराव: राज्य में भले ही भाजपा की सरकार बन गई हो, लेकिन अधिकांश ग्राम पंचायतों और स्थानीय निकायों पर अब भी विपक्षी दल का नियंत्रण है। ग्रामीण स्तर पर केंद्रीय योजनाओं को लागू करने का काम पंचायतें ही करती हैं, इसलिए जमीनी स्तर पर असहयोग और राजनीतिक गतिरोध का सामना नई सरकार को कदम-कदम पर करना पड़ेगा।

सवाल: पश्चिम बंगाल की नई सरकार से आम लोगों को क्या उम्मीद?
जवाब: पश्चिम बंगाल में शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में नई सरकार की सफलता पूरी तरह से कड़े राजकोषीय सुदृढ़ीकरण पर निर्भर करेगी। विशेषज्ञों के अनुसार, सातवें वेतन आयोग को एकमुश्त के बजाय चरणबद्ध तरीके से लागू करना, लोकलुभावन योजनाओं को लक्षित बनाना और सिंडिकेट राज को कुचलकर एमएसएमई व औद्योगिक ढांचे को पुनर्जीवित करना ही एकमात्र व्यावहारिक विकल्प है। डिजिटल गवर्नेंस का उपयोग कर लीकेज रोकना होगा। यदि ये कड़े आर्थिक फैसले नहीं लिए गए, तो बंगाल का यह वित्तीय तनाव एक ऐसे भंवर में तब्दील हो जाएगा, जहां से वापसी लगभग असंभव होगी।

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