असम यूसीसी में लिव-इन कपल्स के लिए रजिस्ट्रेशन अनिवार्य हो सकता है, सरकार को देनी होगी जानकारी
थर्ड आई न्यूज
गुवाहाटी I असम में अब “लिव-इन रिलेशनशिप” को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने स्पष्ट किया है कि राज्य के प्रस्तावित यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) में लिव-इन संबंधों से जुड़े प्रावधान भी शामिल होंगे। इसके बाद लोगों के बीच यह सवाल तेजी से उठने लगा है कि क्या अब शादी के बिना साथ रहने वाले जोड़ों को सरकार के पास अपना संबंध पंजीकृत कराना पड़ेगा?
13 मई 2026 को असम कैबिनेट ने यूसीसी विधेयक के मसौदे को मंजूरी दे दी। मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा ने घोषणा की कि यह विधेयक 26 मई को विधानसभा में पेश किया जाएगा। हालांकि सरकार ने अभी तक पूरे ड्राफ्ट को सार्वजनिक नहीं किया है, लेकिन “लिव-इन रिलेशनशिप के नियमन” का उल्लेख सामने आते ही चर्चा तेज हो गई है।
लोग अब असम के प्रस्तावित कानून की तुलना उत्तराखंड के यूसीसी से करने लगे हैं। इसी वर्ष उत्तराखंड देश का पहला ऐसा राज्य बना था, जहां यूसीसी के तहत लिव-इन कपल्स के लिए रजिस्ट्रेशन अनिवार्य किया गया। वहां कानून के मुताबिक शादी के बिना साथ रहने वाले जोड़ों को सरकार को इसकी जानकारी देनी होती है। ऐसा नहीं करने पर तीन महीने तक की जेल या 25 हजार रुपये तक का जुर्माना, या दोनों सजा का प्रावधान है।
उत्तराखंड मॉडल के समर्थकों का कहना है कि इससे महिलाओं को कानूनी सुरक्षा मिलती है, खासकर परित्याग, भरण-पोषण, घरेलू हिंसा और बच्चों से जुड़े विवादों में। वहीं आलोचकों का मानना है कि निजी रिश्तों में सरकार का हस्तक्षेप उचित नहीं है।
असम सरकार द्वारा यूसीसी में “लिव-इन रिलेशनशिप” का जिक्र किए जाने के बाद खासकर युवाओं के बीच चिंता और उत्सुकता बढ़ गई है। गुवाहाटी जैसे शहरों में अब लिव-इन संबंध पूरी तरह असामान्य नहीं माने जाते, भले ही समाज में इसे लेकर अभी भी संकोच मौजूद हो।
फिलहाल सरकार ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि लिव-इन संबंधों का पंजीकरण अनिवार्य होगा या केवल स्वैच्छिक। यह भी साफ नहीं है कि सरकार सिर्फ कानूनी सुरक्षा देने के लिए व्यवस्था बना रही है या फिर सख्त नियम लागू किए जाएंगे। लेकिन “नियमन” शब्द के इस्तेमाल से इतना जरूर माना जा रहा है कि सरकार इस दिशा में कोई बड़ा कदम उठाने की तैयारी कर रही है।
मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा ने यह भी कहा है कि असम का यूसीसी राज्य के अनुसार “कस्टमाइज्ड” होगा और इससे धार्मिक परंपराओं में हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पहाड़ी और मैदानी जनजातीय समुदाय इस कानून के दायरे से पूरी तरह बाहर रहेंगे।
सरकार एक ओर यूसीसी को विवाह पंजीकरण, महिलाओं के उत्तराधिकार अधिकार और बहुविवाह जैसे मुद्दों पर सुधारवादी कानून के रूप में पेश करना चाहती है, वहीं दूसरी ओर वह यह भी समझती है कि लिव-इन रिलेशनशिप जैसे मुद्दे सामाजिक और राजनीतिक विवाद पैदा कर सकते हैं।
यदि असम में भी लिव-इन कपल्स के लिए अनिवार्य रजिस्ट्रेशन लागू किया जाता है, तो यह राज्य के सामाजिक ढांचे में एक बड़ा बदलाव माना जाएगा। कुछ लोग इसे कानूनी सुरक्षा और अधिकारों की दिशा में कदम मानेंगे, जबकि अन्य इसे निजी जीवन में सरकारी दखल और निगरानी के रूप में देख सकते हैं।
इसके अलावा कई व्यावहारिक सवाल भी उठ रहे हैं। सरकार कैसे तय करेगी कि कौन-सा जोड़ा लिव-इन में रह रहा है? क्या रजिस्ट्रेशन नहीं कराने पर सजा होगी? क्या मकान मालिक या पड़ोसियों की भूमिका बढ़ेगी? और रिश्ता खत्म होने पर क्या प्रक्रिया अपनाई जाएगी? फिलहाल इन सवालों के जवाब सरकार ने सार्वजनिक नहीं किए हैं।
पिछले एक दशक में भारत समेत असम में भी लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर समाज की सोच तेजी से बदली है। जो संबंध पहले पूरी तरह वर्जित माने जाते थे, वे अब शहरी जीवन का हिस्सा बनते जा रहे हैं। अब कानून और राजनीति भी इसी बदलती सामाजिक वास्तविकता के साथ कदम मिलाने की कोशिश करते दिखाई दे रहे हैं।

