ब्रह्मपुत्र पर चीन की मेगा परियोजना पर भूकंप का खतरा, सक्रिय फॉल्ट लाइन पर बन रहा दुनिया का सबसे बड़ा जलविद्युत बांध, भारत की चिंताएँ बढ़ी

थर्ड आई न्यूज़

नई दिल्ली। तिब्बत में यारलुंग जांग्बो (भारत में ब्रह्मपुत्र) नदी पर चीन द्वारा निर्मित किए जा रहे दुनिया के सबसे बड़े जलविद्युत परियोजना को लेकर नई चिंताएं सामने आई हैं। हाल ही में प्रकाशित एक वैज्ञानिक अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि यह मेगा परियोजना एक सक्रिय भू-भ्रंश (फॉल्ट लाइन) पर स्थित है, जिससे भविष्य में भूकंप, भूस्खलन और भू-अस्थिरता का खतरा बढ़ सकता है।

अध्ययन के अनुसार, पाइझेन फॉल्ट (Paizhen Fault) हजारों वर्षों से सक्रिय है। इस कारण परियोजना क्षेत्र की चट्टानें कमजोर हो चुकी हैं, जिससे बांध तथा अन्य संरचनाओं की स्थिरता प्रभावित हो सकती है। वैज्ञानिकों ने संभावित भूस्खलन के जोखिम को कम करने के लिए ढलानों को मजबूत करने और अतिरिक्त सुरक्षा संरचनाएं विकसित करने की सलाह दी है।

2033 तक पूरा होगा दुनिया का सबसे बड़ा जलविद्युत प्रकल्प

यह परियोजना यारलुंग जांग्बो नदी के ‘ग्रेट बेंड’ (Great Bend) क्षेत्र में बनाई जा रही है, जहां नदी लगभग 2,000 मीटर गहरी घाटी से होकर भारत की ओर प्रवेश करती है। परियोजना के वर्ष 2033 तक पूर्ण होने की संभावना है। इसके बाद यह प्रतिवर्ष लगभग 300 अरब किलोवाट-घंटे (300 Billion kWh) बिजली का उत्पादन करेगी, जो चीन के प्रसिद्ध थ्री गॉर्जेस डैम की क्षमता से लगभग तीन गुना अधिक होगी।

अध्ययन में यह भी उल्लेख किया गया है कि परियोजना के निकट स्थित पाई गांव हिमालय के अत्यधिक भूकंप-संवेदनशील क्षेत्र में स्थित है। वैज्ञानिकों ने वर्ष 2017 में आए 6.9 तीव्रता के भूकंप का उल्लेख करते हुए कहा कि यह क्षेत्र भूगर्भीय दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील है।

भारत की चिंता क्यों बढ़ी?

यारलुंग जांग्बो नदी अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश करने के बाद सियांग कहलाती है, आगे असम में यही नदी ब्रह्मपुत्र के नाम से बहती है और बाद में बांग्लादेश में जमुना के नाम से जानी जाती है। इस नदी पर करोड़ों लोगों की पेयजल, कृषि, मत्स्य पालन, परिवहन और आजीविका निर्भर करती है।

चीन का दावा है कि यह ‘रन-ऑफ-द-रिवर’ (Run-of-the-River) परियोजना है और इससे निचले क्षेत्रों में पानी के प्रवाह पर कोई बड़ा प्रभाव नहीं पड़ेगा। हालांकि विशेषज्ञ इस दावे को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं। उनका मानना है कि यदि किसी समय बड़ी मात्रा में पानी छोड़ा गया तो अचानक बाढ़ (फ्लैश फ्लड) की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। वहीं, शुष्क मौसम में यदि पानी का भंडारण किया गया तो भारत और बांग्लादेश की ओर नदी के प्राकृतिक प्रवाह में कमी आ सकती है।

विशेषज्ञों ने यह भी आशंका व्यक्त की है कि बांध नदी के साथ बहकर आने वाली गाद (Sediment) को रोक सकता है, जिससे ब्रह्मपुत्र के उपजाऊ मैदानी क्षेत्रों की उर्वरता प्रभावित हो सकती है। इसके अतिरिक्त, चूंकि यह परियोजना भूकंप संभावित क्षेत्र में स्थित है, इसलिए भविष्य में किसी बड़े भूकंप की स्थिति में इसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं।

भारत पहले ही इस परियोजना को लेकर अपनी चिंताएं चीन के समक्ष व्यक्त कर चुका है। साथ ही भारत सरकार परियोजना की प्रगति और इसके संभावित प्रभावों पर लगातार नजर बनाए हुए है, ताकि ब्रह्मपुत्र के निचले क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के हितों की रक्षा की जा सके।

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