आदिवासियों को बाहर रखकर यूसीसी को ‘समान’ नहीं कहा जा सकता : कांग्रेस नेता जुबैर अनाम

थर्ड आई न्यूज

गुवाहाटी। असम कांग्रेस नेता जुबैर अनाम ने प्रस्तावित समान नागरिक संहिता (यूसीसी) विधेयक पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि इसमें आदिवासी और गैर-आदिवासी समुदायों के लिए अलग-अलग प्रावधान रखे जाते हैं, तो इसे “समान” नागरिक संहिता नहीं कहा जा सकता।

मंगलवार को मीडिया से बातचीत करते हुए अनाम ने कहा कि यदि यह विधेयक अच्छा है तो इसे सभी पर समान रूप से लागू किया जाना चाहिए, और यदि यह खराब है तो इसे बिल्कुल लागू नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, “यदि यह बिल अच्छा है तो सबके लिए होना चाहिए और अगर खराब है तो इसे लागू ही नहीं किया जाना चाहिए।”

जुबैर अनाम ने विधेयक के मसौदे में आदिवासी समुदायों को कुछ प्रावधानों से बाहर रखने पर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि इससे व्यावहारिक और कानूनी जटिलताएं पैदा होंगी। उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा, “यदि किसी गैर-आदिवासी व्यक्ति को लिव-इन रिलेशनशिप का पंजीकरण कराना होगा, लेकिन वह किसी आदिवासी युवती के साथ रह रहा हो, तो उस स्थिति में क्या होगा?”

उन्होंने कहा कि यूसीसी का मूल सिद्धांत कानून के समक्ष समानता है। “‘यूनिफॉर्म’ का मतलब समान होता है। यदि यह वास्तव में समान नागरिक संहिता है, तो इसे सभी पर समान रूप से लागू होना चाहिए,” उन्होंने कहा।

कांग्रेस नेता ने यह भी सवाल उठाया कि यदि विधेयक लोगों के कल्याण के लिए है, तो फिर किसी एक समुदाय को इससे बाहर क्यों रखा जा रहा है।

इस दौरान जुबैर अनाम ने महंगाई और बेरोजगारी के मुद्दे पर भी भाजपा सरकार को घेरा। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनावों के दौरान कीमतों को नियंत्रित रखा गया और चुनाव खत्म होते ही पेट्रोल-डीजल समेत आवश्यक वस्तुओं के दाम बढ़ा दिए गए। उन्होंने कहा, “जब ईंधन की कीमतें बढ़ती हैं, तो हर चीज महंगी हो जाती है।”

महिला आरक्षण विधेयक पर उन्होंने कहा कि कांग्रेस इसका समर्थन करती है, लेकिन इसे परिसीमन से जोड़ने के बजाय बिना किसी शर्त के लागू किया जाना चाहिए।

ईद के दौरान कुछ मुस्लिम समुदायों द्वारा गाय की कुर्बानी नहीं देने के फैसले पर मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा की टिप्पणी को लेकर पूछे गए सवाल पर अनाम ने कहा कि यह असली मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश है। उन्होंने कहा, “महंगाई और बेरोजगारी जैसे मुद्दे आज जनता के सामने सबसे बड़ी चिंता हैं, लेकिन उनसे ध्यान हटाने के लिए विभाजनकारी बहसें पैदा की जा रही हैं।”

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