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संवैधानिक समता और प्राकृतिक न्याय के लिए गाइडलाइंस पर पुनर्विचार की मांग, विप्र फाउंडेशन असम ने जताई आपत्ति

थर्ड आई न्यूज़

गुवाहाटी। संवैधानिक समता और प्राकृतिक न्याय सुनिश्चित करने के उद्देश्य से प्रस्तावित गाइडलाइंस पर पुनर्विचार एवं संशोधन की मांग करते हुए विप्र फाउंडेशन असम की प्रदेशाध्यक्ष मंजुलता शर्मा, गुवाहाटी चैप्टर अध्यक्ष शिवकुमार पारीक तथा विप्र फाउंडेशन की टीम ने मीडिया के माध्यम से अपना पक्ष रखा। इस दौरान संगठन ने गाइडलाइंस की कुछ धाराओं पर आपत्ति जताते हुए इन्हें अधिक संतुलित एवं निष्पक्ष बनाने की आवश्यकता पर बल दिया।

विप्र फाउंडेशन की ओर से कहा गया कि यह एक राष्ट्रव्यापी सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन है, जो शिक्षा, सामाजिक समरसता, समान अवसर तथा राष्ट्र-निर्माण के कार्यों के लिए निरंतर समर्पित भाव से कार्य कर रहा है। संगठन का मानना है कि समता और सामाजिक न्याय का उद्देश्य निस्संदेह प्रशंसनीय है, किंतु किसी भी गाइडलाइंस का स्वरूप ऐसा होना चाहिए जो भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों, प्राकृतिक न्याय और निष्पक्ष प्रक्रिया की कसौटी पर पूर्णतः खरा उतरे।

विप्र फाउंडेशन ने कहा कि गाइडलाइंस की कुछ धाराएँ और प्रस्तावित कार्य प्रणाली समानता के अधिकार, भेदभाव-निषेध तथा जीवन एवं व्यक्तिगत गरिमा के अधिकार की भावना के अनुरूप संतुलित, सर्वसमावेशी और निष्पक्ष प्रतीत नहीं होतीं। संगठन ने यह भी चिंता व्यक्त की कि इसका “शिकायत-आधारित ढांचा” चुगली की संस्कृति को बढ़ावा दे सकता है, जिससे शैक्षणिक परिसरों में भय, दबाव, ध्रुवीकरण और वर्ग-आधारित टकराव की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।

विप्र फाउंडेशन असम ने माननीय प्रधानमंत्री के प्रति विश्वास व्यक्त करते हुए कहा कि उनके नेतृत्व में भारत सरकार “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास” के मूल मंत्र और संवैधानिक मर्यादाओं के अनुरूप उच्च शिक्षा से संबंधित गाइडलाइंस को न्यायपूर्ण, संतुलित, तथ्याधारित और समरसतापूर्ण बनाए रखने हेतु आवश्यक कदम अवश्य उठाएगी।

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