कामाख्या मंदिर पर अधिकार के दावे के बीच कोच-राजबोंगशी प्रदर्शन से हंगामा, अदालत के फैसले में क्या है?
थर्ड आई न्यूज
गुवाहाटी, 25 सितंबर। कामाख्या मंदिर के ऐतिहासिक संबंध और प्रबंधन अधिकार को लेकर कोच-राजबोंगशी समुदाय की ओर से उठ रही आवाजों के बीच 23 सितंबर को नीलाचल पहाड़ स्थित कामाख्या मंदिर परिसर में हुए प्रदर्शन ने विवाद को नया रूप दे दिया है। प्रदर्शन के दौरान मंदिर प्रबंधन और पुलिस के साथ कथित झड़प के बाद मामला गरमा गया। मंदिर प्रशासन ने घटना को लेकर पुलिस में शिकायत दर्ज कराने की बात कही है।
प्रदर्शन में बड़ी संख्या में कोच-राजबोंगशी समुदाय के लोग शामिल हुए। मंदिर प्रशासन के अनुसार पश्चिम बंगाल से राज्यसभा सांसद एवं कोच-राजबोंगशी नेता अनंत महाराज भी प्रदर्शन के दौरान मौजूद थे। कामाख्या मंदिर के दोलोई हिमाद्रि शर्मा के अनुसार प्रदर्शनकारी सुबह करीब पांच बजे से मंदिर परिसर में पहुंचने लगे और कथित तौर पर अलग-अलग श्रद्धालुओं के रूप में परिसर में प्रवेश करते रहे। सुबह 10 से 11 बजे के बीच उनकी संख्या बढ़ गई और बड़ी संख्या में लोग परिसर में एकत्र हो गए। मंदिर प्रशासन का कहना है कि प्रदर्शन की पूर्व सूचना पुलिस या मंदिर प्रबंधन को नहीं दी गई थी। बाद में कुछ प्रदर्शनकारियों और मंदिर प्रशासन तथा पुलिसकर्मियों के बीच कथित रूप से विवाद हुआ।
हालांकि, प्रदर्शन के पीछे कोच-राजबोंगशी समुदाय की विशिष्ट कानूनी या प्रशासनिक मांग क्या थी, इसकी पूरी जानकारी अभी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं हुई है। इसी कारण यह सवाल उठ रहा है कि क्या समुदाय कामाख्या मंदिर पर अपने अधिकार का दावा कर रहा है और क्या इस संबंध में कोई अदालत का फैसला उसके पक्ष में आया है।
क्या अदालत ने कोच-राजबोंगशी समुदाय को कामाख्या का अधिकार दिया है?
उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड के आधार पर फिलहाल इसका उत्तर नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के 7 जुलाई 2015 के महत्वपूर्ण फैसले Riju Prasad Sarma बनाम State of Assam में कामाख्या मंदिर के प्रबंधन से जुड़े परंपरागत अधिकारों पर विचार किया गया था। अदालत ने कामाख्या के बोर देउरी समाज और उनके निर्वाचित दोलोई के परंपरागत अधिकारों को महत्वपूर्ण माना था। फैसले में बोर देउरी परिवारों और दोलोई की धार्मिक तथा लौकिक प्रबंधन संबंधी भूमिका का उल्लेख है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले में यह भी दर्ज है कि 25 फरवरी 1931 के एक पुराने मुकदमे में दोलोई के पक्ष में निर्णय आया था। उस मुकदमे में कामाख्या एंडोमेंट के प्रबंधन और बोर देउरी परिवारों द्वारा दोलोई के चयन से जुड़े परंपरागत अधिकारों पर विचार हुआ था। न्यायालय के रिकॉर्ड के अनुसार बोर देउरी परिवारों को परंपरागत रूप से मंदिर के ट्रस्टियों के रूप में और दोलोई को उनके प्रतिनिधि या प्रबंधक के रूप में देखा गया था।
2015 में सुप्रीम कोर्ट ने भी यह माना कि बोर देउरी समाज और उनके निर्वाचित दोलोई को कामाख्या मंदिर के धार्मिक एवं लौकिक मामलों के प्रबंधन में परंपरागत अधिकार प्राप्त हैं।
इन फैसलों में कोच-राजबोंगशी समुदाय को कामाख्या मंदिर का स्वामित्व या सामुदायिक प्रबंधन अधिकार देने का कोई आदेश नहीं मिलता।
कोच राजवंश का कामाख्या से ऐतिहासिक संबंध :
कामाख्या मंदिर और कोच राजवंश का ऐतिहासिक संबंध जरूर अत्यंत महत्वपूर्ण है। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, 16वीं शताब्दी में कोच राजा नरनारायण के शासनकाल में कामाख्या मंदिर का पुनर्निर्माण कराया गया था। उनके भाई चिलाराय की भी इस ऐतिहासिक प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है।
मंदिर के इतिहास से जुड़े विवरणों के अनुसार वर्ष 1565 के आसपास कोच शासनकाल में मंदिर का पुनर्निर्माण हुआ। इसी दौर में विकसित वास्तुकला को बाद में ‘नीलाचल शैली’ के नाम से जाना गया।
इस प्रकार कोच राजवंश का कामाख्या मंदिर के पुनर्निर्माण और संरक्षण से ऐतिहासिक संबंध एक तथ्य है, जबकि वर्तमान समय में मंदिर के प्रबंधन अथवा स्वामित्व का कानूनी अधिकार किसे प्राप्त है, यह अलग कानूनी प्रश्न है।
इतिहास और कानूनी अधिकार में अंतर :
किसी राजवंश द्वारा किसी मंदिर का निर्माण या पुनर्निर्माण कराया जाना अपने आप में उस राजवंश से जुड़े पूरे समुदाय को वर्तमान समय में मंदिर का कानूनी स्वामित्व या प्रबंधन अधिकार नहीं देता। ऐसे अधिकार न्यायालय के निर्णय, वैध दस्तावेजों, स्थापित परंपरागत अधिकारों और लागू कानून के आधार पर निर्धारित होते हैं।
कामाख्या से संबंधित उपलब्ध सुप्रीम कोर्ट के फैसले में जिस परंपरागत प्रबंधन अधिकार की चर्चा हुई है, वह बोर देउरी समाज और दोलोई व्यवस्था से संबंधित है, न कि कोच-राजबोंगशी समुदाय को सामूहिक रूप से मंदिर का अधिकार देने से।
23 सितंबर के प्रदर्शन से बढ़ा नया सवाल :
ऐसे में 23 सितंबर का प्रदर्शन कई सवाल खड़े करता है। यदि प्रदर्शन का उद्देश्य वास्तव में कामाख्या मंदिर के प्रबंधन अथवा अधिकार में कोच-राजबोंगशी समुदाय की भूमिका स्थापित करना है, तो आयोजकों की ओर से उनकी कानूनी मांग, ऐतिहासिक आधार और संबंधित न्यायालयीन दस्तावेज सार्वजनिक करना महत्वपूर्ण होगा।
फिलहाल उपलब्ध रिपोर्टों में प्रदर्शन के दौरान हुई कथित झड़प और मंदिर प्रशासन की शिकायत की बात सामने आई है, लेकिन प्रदर्शन की विस्तृत मांग स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं है। मंदिर प्रशासन ने कहा है कि घटना की परिस्थितियों की जांच की जाएगी और दोनों पक्षों के आरोपों की पड़ताल होगी।

