लीक ऑडियो से असम में विवाद, मीडिया संस्थान के मालिक पर खबर रोकने के बदले पैसे मांगने का आरोप
थर्ड आई न्यूज
गुवाहाटी, 14 अक्टूबर। असम में एक लीक ऑडियो रिकॉर्डिंग सामने आने के बाद मीडिया जगत में विवाद खड़ा हो गया है। इस कथित ऑडियो बातचीत में प्राग न्यूज के मालिक संजीव नारायण और व्यवसायी नयन घोष के बीच हुई बातचीत को लेकर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं। नयन घोष ने आरोप लगाया है कि उनके खिलाफ नशीले पदार्थों की तस्करी से संबंधित खबर प्रसारित नहीं करने के बदले संजीव नारायण ने उनसे पैसे की मांग की थी। हालांकि, संजीव नारायण ने इन आरोपों को खारिज करते हुए दावा किया है कि बातचीत मर्सिडीज कार की खरीद-बिक्री से संबंधित थी।
गौरतलब है कि संबंधित समाचार चैनल ने इससे पहले नयन घोष पर मादक पदार्थों की तस्करी में संलिप्त होने के आरोप लगाए थे। अब कथित ऑडियो सामने आने के बाद इस पूरे मामले ने नया मोड़ ले लिया है।
संजीव नारायण ने बातचीत से इनकार नहीं किया, बताया कार सौदे से जुड़ा मामला
ऑडियो के वायरल होने के बाद आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में संजीव नारायण ने नयन घोष के साथ बातचीत होने से इनकार नहीं किया। उन्होंने कहा कि वे घोष को मर्सिडीज कार के ग्राहक के रूप में जानते थे और उनके कथित तौर पर मादक पदार्थों की तस्करी में शामिल होने की जानकारी उन्हें प्राग न्यूज पर खबर प्रसारित होने के बाद मिली।
संजीव नारायण के पास गुवाहाटी में मर्सिडीज-बेंज कारों की एक डीलरशिप भी है। उन्होंने दावा किया कि संबंधित बातचीत कार के सौदे के सिलसिले में हुई थी।
हालांकि, सार्वजनिक रूप से प्रसारित हो रही ऑडियो रिकॉर्डिंग में कार खरीदने या बेचने का कोई स्पष्ट उल्लेख सुनाई नहीं देता। बातचीत में कथित तौर पर संजीव नारायण नयन घोष से पूछते सुनाई देते हैं कि उनके अपने संपादकों सहित इतने सारे लोग उनसे नाराज क्यों हैं।
इसके बाद वे कथित तौर पर कहते हैं कि घोष के खिलाफ खबर का दूसरा हिस्सा प्रसारित करने के लिए तैयार है, लेकिन उन्होंने किसी तरह इसके प्रसारण को रुकवा रखा है।
‘बस्तु’ शब्द को लेकर उठे सवाल :
कथित बातचीत में संजीव नारायण यह कहते सुनाई देते हैं कि उन्होंने अपने संपादकों को खबर प्रसारित करने से इसलिए रोक रखा है, क्योंकि नयन घोष उन्हें ‘बस्तु’ भेजेंगे। असमिया भाषा में ‘बस्तु’ का अर्थ वस्तु या चीज होता है। बातचीत के दौरान वे कथित तौर पर घोष से इसे जल्द भेजने के लिए भी कहते हैं।
इसके जवाब में नयन घोष कहते सुनाई देते हैं कि वे उस व्यक्ति से बात करेंगे, जिसके पास उनके पैसे रहते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि वह व्यक्ति संजीव नारायण को फोन करेगा और उनसे फोन उठाने का अनुरोध किया।
इस बातचीत में ‘बस्तु’ से वास्तव में क्या अभिप्राय था, इसे लेकर विवाद पैदा हो गया है। संजीव नारायण इसे कार के सौदे से जुड़ा मामला बता रहे हैं, जबकि नयन घोष का आरोप है कि यह शब्द खबर रोकने के बदले मांगी गई रकम के संदर्भ में इस्तेमाल किया गया था।
हालांकि, लीक ऑडियो की प्रामाणिकता, उसकी पूर्णता और बातचीत के पूरे संदर्भ की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए केवल इस रिकॉर्डिंग के आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा।
ऑडियो लीक करने वालों के खिलाफ अदालत जाने की तैयारी :
संजीव नारायण ने घोषणा की है कि वे बातचीत की रिकॉर्डिंग लीक करने के मामले में नयन घोष तथा इस ऑडियो को प्रसारित करने वाले समाचार संगठनों के खिलाफ अदालत का रुख करेंगे। उनका कहना है कि इस रिकॉर्डिंग से उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने का प्रयास किया गया है। उन्होंने ऑडियो की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाए हैं।
दूसरी ओर, नयन घोष, जो फिलहाल असम से बाहर हैं, ने एक वीडियो जारी कर मादक पदार्थों की तस्करी में किसी भी तरह की संलिप्तता से इनकार किया है। उन्होंने स्वयं को एक व्यवसायी बताते हुए अपना आरोप दोहराया कि संजीव नारायण ने उनके खिलाफ कथित रूप से झूठी और मनगढ़ंत खबरों के आगे के प्रसारण को रोकने के बदले पैसे मांगे थे।
घोष ने यह भी दावा किया है कि उन्होंने चैनल की कथित तौर पर झूठी खबरों के खिलाफ पहले अदालत का दरवाजा खटखटाया था और प्रसारण पर रोक लगाने का आदेश प्राप्त किया था। हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है।
असम पुलिस की भूमिका पर भी उठे सवाल :
इस विवाद ने असम पुलिस की भूमिका को लेकर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा मादक पदार्थों की तस्करी के खिलाफ कई बार जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाने की बात कह चुके हैं। ऐसे में यह जानना महत्वपूर्ण हो गया है कि नयन घोष के खिलाफ चैनल द्वारा लगाए गए आरोपों का आधार क्या था और क्या इस संबंध में पुलिस को कोई ठोस साक्ष्य उपलब्ध कराए गए थे।
यदि चैनल के पास घोष को मादक पदार्थों की तस्करी से जोड़ने वाले विश्वसनीय साक्ष्य थे, तो क्या उन्हें पुलिस के साथ साझा किया गया? क्या पुलिस ने इन आरोपों की जांच की या इस संबंध में कोई मामला दर्ज किया? ये ऐसे सवाल हैं, जिनके जवाब सामने आना अभी बाकी हैं।
कथित ऑडियो में नयन घोष यह कहते हुए भी सुनाई देते हैं कि पुलिस के कई अधिकारियों ने उन्हें उनके खिलाफ प्रसारित खबरों की वीडियो क्लिप भेजी थीं। यदि इस दावे की पुष्टि होती है, तो संबंधित अधिकारियों और घोष के बीच हुए संवाद की प्रकृति की जांच की जा सकती है। हालांकि, किसी अधिकारी द्वारा समाचार की क्लिप भेजना अपने आप में किसी गलत कार्य का प्रमाण नहीं है।
क्या खबर रोकने के बदले पैसे मांगने का प्रयास हुआ?
इस विवाद का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू नयन घोष का यह आरोप है कि उनके खिलाफ और खबरें प्रसारित करने की धमकी देकर उनसे पैसे मांगे गए।
यदि जांच में यह साबित होता है कि किसी व्यक्ति के खिलाफ मनगढ़ंत आरोपों का इस्तेमाल खबर रोकने के बदले पैसे वसूलने के लिए किया गया, तो यह जबरन वसूली सहित अन्य संभावित आपराधिक कृत्यों से जुड़े गंभीर सवाल खड़े कर सकता है।
लेकिन ऐसा कोई निष्कर्ष निकालने से पहले ऑडियो की प्रामाणिकता, बातचीत का पूरा संदर्भ और प्रस्तावित भुगतान का वास्तविक उद्देश्य स्थापित करना आवश्यक होगा। फिलहाल न तो लीक ऑडियो और न ही दोनों पक्षों के परस्पर विरोधी आरोप अपने आप में किसी की आपराधिक संलिप्तता साबित करते हैं।
इस मामले पर प्रतिक्रिया जानने के लिए गुवाहाटी के पुलिस आयुक्त से संपर्क किया गया था। उनसे पूछा गया कि क्या पुलिस इस विवाद का संज्ञान लेगी, जिसमें एक ओर मादक पदार्थों की तस्करी के आरोपों और दूसरी ओर खबर रोकने के बदले पैसे मांगे जाने के आरोपों का मामला सामने आया है। हालांकि, पुलिस आयुक्त ने टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।
मीडिया की जवाबदेही और निष्पक्ष जांच का सवाल :
इस पूरे घटनाक्रम ने मीडिया की जवाबदेही, संपादकीय अधिकारों के संभावित दुरुपयोग और कानून प्रवर्तन एजेंसियों की भूमिका पर व्यापक बहस छेड़ दी है।
मामले में दो अलग-अलग पहलुओं की निष्पक्ष जांच आवश्यक है। पहला, नयन घोष के खिलाफ मादक पदार्थों की तस्करी से जुड़े आरोपों का आधार क्या है और क्या उन पर पुलिस कार्रवाई की आवश्यकता है। दूसरा, क्या किसी व्यक्ति के खिलाफ प्रतिकूल खबरें प्रसारित करने की धमकी देकर उससे धन प्राप्त करने का प्रयास किया गया।
यदि घोष के खिलाफ लगाए गए आरोप सही साबित होते हैं, तो यह सवाल उठेगा कि पुलिस ने अब तक क्या कार्रवाई की है। वहीं, यदि जांच में यह सामने आता है कि खबरें रोकने के बदले पैसे मांगने के लिए आरोपों को गढ़ा गया था, तो खबर तैयार करने और उसके प्रसारण को नियंत्रित करने वाले लोगों की भूमिका भी जांच के दायरे में आएगी।
फिलहाल इस विवाद में आरोप और प्रत्यारोप दोनों सामने हैं, लेकिन किसी भी पक्ष के दावों की निर्णायक पुष्टि नहीं हुई है। स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच से ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि कथित बातचीत के पीछे वास्तविक मामला क्या था और क्या इसमें किसी कानून का उल्लंघन हुआ है।

