अल्फा की तारीफ पर असम में सियासी घमासान, कांग्रेस ने अमित शाह से मांगा जवाब

थर्ड आई न्यूज

मंत्री विश्वजीत दैमारी के बयान पर कांग्रेस ने उठाए सवाल, प्रतिबंधित संगठन की कानूनी स्थिति स्पष्ट करने की मांग

गुवाहाटी, 29 अक्टूबर। असम में प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (अल्फा) को लेकर दिए गए एक बयान पर राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। असम प्रदेश कांग्रेस कमेटी (एपीसीसी) ने राज्य सरकार के कैबिनेट मंत्री विश्वजीत दैमारी की टिप्पणियों पर जवाबदेही तय करने और अल्फा की मौजूदा कानूनी स्थिति स्पष्ट करने की मांग करते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखा है।

विवाद की शुरुआत तिनसुकिया जिले के काकोपाथार में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान मंत्री विश्वजीत दैमारी के कथित बयान से हुई। उन्होंने अल्फा के नेतृत्व में मोरान और मटक समुदायों की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि इस संगठन की मौजूदगी ने करीब पांच दशकों तक असम की रक्षा की।

दैमारी के हवाले से कहा गया, “ अल्फा की वजह से कोई भी असम पर हाथ डालने की हिम्मत नहीं कर पाया।” उनके इस बयान को लेकर कांग्रेस ने सवाल उठाए हैं और केंद्र सरकार से इस मामले में अपना रुख स्पष्ट करने की मांग की है।

कांग्रेस ने पूछा—प्रतिबंधित संगठन की तारीफ पर सरकार का क्या रुख है?
कांग्रेस नेता मीरा बोरठाकुर ने सोशल मीडिया के माध्यम से मंत्री के बयान की आलोचना की। उन्होंने सवाल उठाया कि विश्वजीत दैमारी के बयान के लिए जवाबदेही कौन तय करेगा। कांग्रेस ने यह भी पूछा कि यदि राज्य सरकार के मंत्री किसी प्रतिबंधित संगठन की प्रशंसा करते हैं, तो क्या इसे सरकार की नीति में बदलाव के संकेत के रूप में देखा जाना चाहिए? पार्टी ने आशंका जताई कि इस तरह के बयान युवाओं को उग्रवाद की ओर प्रेरित कर सकते हैं।

एपीसीसी ने केंद्रीय गृह मंत्री से इस विषय पर स्पष्टता देने और प्रतिबंधित संगठन के संबंध में सरकार की वर्तमान नीति बताने की मांग की है।

अल्फा के दोनों गुटों की स्थिति अलग-अलग :
अल्फा असम में लंबे समय से सक्रिय रहा है। संगठन की गतिविधियों और राज्य में उग्रवाद के इतिहास को देखते हुए इससे संबंधित किसी भी राजनीतिक बयान को संवेदनशील माना जाता है।

उल्लेखनीय है कि दिसंबर 2023 में अल्फा के वार्ता समर्थक गुट ने केंद्र और असम सरकार के साथ शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इस समझौते का उद्देश्य असम में शांति स्थापित करने और संगठन से जुड़े मुद्दों के समाधान की दिशा में आगे बढ़ना था।

हालांकि, परेश बरुआ के नेतृत्व वाला अल्फा-इंडिपेंडेंट गुट शांति समझौते में शामिल नहीं हुआ। मूल समाचार के अनुसार, यह गुट अब भी प्रतिबंधित गैरकानूनी संगठन के रूप में सूचीबद्ध है।

इस प्रकार, अल्फा के एक गुट के साथ शांति समझौता होने और दूसरे गुट के प्रतिबंधित बने रहने के बीच अंतर को समझना महत्वपूर्ण है।

बयान से बढ़ी राजनीतिक बहस :
मंत्री विश्वजीत दैमारी की टिप्पणी के बाद असम में उग्रवाद, शांति प्रक्रिया और प्रतिबंधित संगठनों के प्रति राजनीतिक नेतृत्व के रुख को लेकर बहस तेज हो गई है। कांग्रेस ने केंद्र सरकार से स्पष्टीकरण मांगा है, जबकि इस मामले में केंद्र और राज्य सरकार की आधिकारिक प्रतिक्रिया तथा मंत्री के बयान का विस्तृत संदर्भ सामने आने के बाद ही पूरे विवाद की स्थिति अधिक स्पष्ट हो सकेगी।

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