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चौथमल कैसे बना सी.एम

विनोद रिंगानिया

शहर में सभी लोग चौथमल अग्रवाल को सी.एम. या सी.एम. साहब कहकर पुकारते हैं। जो ऐसा नहीं करता उससे चौथमल बाबू कट्टी कर लेते हैं। कैसे चौथमल रातोंरात सी.एम. साहब बन गया, इसकी सच्ची गाथा हम आज आप सभी को बताएंगे, ताकि नई पीढ़ी के बच्चों को सारी जानकारी रहे।
बात तब की है जब चौथमल अग्रवाला कुछ नया करने की सोच रहे थे। उनकी काफी उम्र हो गई थी लेकिन उस उम्र में भी वे हरदम कुछ न कुछ नया करने की फिराक में रहते थे। यही तो कारण है उनकी दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की का। हालाँकि यह कारण मैं बता रहा हूँ, चौथमल अग्रवाला नहीं। चौथमल बाबू अपनी उन्नति का कारण अपने घर के सही वास्तु को बताते हैं। हरियाणे से कोई एक वास्तुशास्त्री आए थे। उन्होंने चौथमल बाबू से कहा था कि आपका सबकुछ सही है लेकिन यदि आप अपनी देहलीज पर कोई सोने से बनी वस्तु गाड़ दें तो आपकी उन्नति को फिर कोई नहीं रोक सकता। चौथमल बाबू ने अपनी एनीवर्सरी पर पत्नी को जो सोना दिया था वह भी शुद्ध सोने का नहीं था लेकिन देहलीज पर गाड़ने के लिए जो सोना लाए थे वह शुद्ध ही था। देवताओं से बेईमानी नहीं करनी चाहिए, यह चौथमल बाबू का उसूल है। और एक बात है, लोग वास्तुशास्त्र को जो कुछ भी कहे, यह सोना गाड़ने के बाद उनके यहाँ दिन दून रात चौगुनी उन्नति होनी शुरू हो गई।
सबसे अच्छी बात तो यह हुई कि उनका युवराज तीन बार प्रयास करने के बाद भी बेंगलोर में इंजीनियरिंग की परीक्षा पास नहीं कर पाया। इसलिए वह लौटकर घर आ गया और चौथमल बाबू का सारा बिजनेस संभाल लिया। उसे मॉडर्न रूप दे दिया। बच्चे के बिजनेस संभाल लेने पर सबसे अधिक खुशी चौथमल बाबू के ग्राहकों और डीलरों को हुई। क्योंकि अब उनको चौथमल बाबू के लंबे-लंबे भाषण नहीं सुनने पड़ते – कि कैसे उन्होंने हजार रुपए की पूंजी से इतना बड़ा साम्राज्य खड़ा कर लिया।
जो भी हो, हम बात को आगे बढ़ाते हैं। उन दिनों चौथमल बाबू के दिमाग में यह बात घर कर गई थी कि यह जिंदगी है ही कितने दिन की। इसलिए जो कुछ करना है जल्दी से कर लेना है। उनके काम की फेहरिश्त काफी लंबी है। लगभग उतनी ही लंबी जितनी उनके पंडित की पूजा की सामग्री की होती है। जैसे कि उन्हें जल्दी से जल्दी से बड़ा साहित्यकार बनना है और नाम कमाना है। उन्हें आर्टिस्ट बनना है। उन्हें अभिनेता बनना है। उन्हें नेता बनना है और इसकी शुरुआत किसी विधानसभा क्षेत्र का टिकट पाने से करना है।
एक दिन चौथमल बाबू ने अपने साहित्यिक मित्रों की मीटिंग बुलाई। इस मीटिंग में रामसेवक जी आए, राम निवास शर्मा आए और भी बहुत से लोग आए। रामसेवक जी हमेशा कहते रहे हैं कि “सर आपको साहित्य में आना चाहिए। कहिए तो आपके नाम से एक कविता संग्रह निकलवा दूँ।“
“कविता संग्रह?” चौथमल बाबू ललचाई नजरों से रामसेवक से पूछते। “क्या यह असली होगा?”
“अरे, सर आप भी। आज के दिन कौन असली लिखता है। इसका लिखा वो नकल करता है, फिर दूसरा उस नकल की नकल करता है। आप ठीक से छानबीन करें तो पाएंगे कि रवींद्रनाथ का लिखा भी उनका अपना लिखा नहीं था। वो भी इधर-उधर से नकल किया हुआ पाएंगे। इंटरनेट पर सबकुछ मिल जाता है।”
राम निवास शर्मा ने हाँ में हाँ मिलाई। लेकिन तभी चौथमल बाबू का नालायक बेटा कमरे में प्रवेश कर गया और उसके कान में वार्तालाप का अंतिम अंश पड़ गया। वह टोक देता है – “इंटरनेट? रवींद्रनाथ के जमाने में तो इंटरनेट था ही नहीं।”
नालायक बेटे के बीच में बोलने से चौथमल बाबू तो नाराज हुए ही रामसेवक और राम निवास भी नाराज हो गए। चौथमल बाबू ने बेटे को डपटा और कहा कि ये साहित्य की बातें हैं, तुम अभी इनसे दूर ही रहो तो अच्छा है।
रामसेवक जी ने चौथमल बाबू को कविता संग्रह की बात कहकर खुश कर दिया था। राम निवास शर्मा को अब तक ऐसा मौका नहीं मिला था। इसलिए उसके पेट में गैस हो गई। उसे डकारों पर डकारें आने लगीं। वह इसका इलाज भी जानता है। उसने कहा – “सर, आपको पहले अपना नाम ठीक कर लेना चाहिए। मेरे विचार से आपको चौथमल के स्थान पर अब से सी.एम. शब्द का इस्तेमाल करना चाहिए। इससे बहुत अच्छा प्रभाव जाएगा।”
चौथमल बाबू के हृदय में गुदगुदी हुई। लेकिन उन्हें डर था कि रामनिवास शर्मा का कई जन्मों का प्रतिद्वंद्वी रामसेवक कहीं इसका विरोध न कर दे। उन्होंने दिखाने के लिए कहा – “सी.एम.? इस पर कहीं मुख्यमंत्री महोदय नाराज तो नहीं हो जाएंगे। और कहीं लोग मुझे ही सी.एम. समझने लग गए तो? गाँव के अनपढ़ लोगों का कोई भरोसा नहीं है।”
चौथमल बाबू ने खुद ही इतना आसान-सा कैच राम निवास शर्मा को दे दिया, तो वह उसे लपकने से कैसे चूकता। उसने कहा – “आप कौन-से सी.एम. से कम हैं। सर। आपने अपने दम पर यह साम्राज्य खड़ा किया है। राजनीति का क्या है, वह तो निन्यानबे प्रतिशत भाग्य पर टिकी होती है। लेकिन आपने तो…याद आया उस दिन सी.एम. सर के यहाँ आपकी बात निकली थी।…”
“मेरी बात?” चौथमल बाबू, जो थोड़ी देर बाद सी.एम. बाबू बनने वाले थे, को फिर से गुदगुदी हुई। “क्या बात हुई?”
“यही कि इस आदमी के जिगरे को मानना पड़ेगा। हमने खुद देखा है कैसे यह साइकिल के कैरियर पर सामान रखकर बाजार में बेचने जाया करता था। यह बड़ा ही ग्राउंडेड आदमी है।”
चौथमल बाबू ने ग्राउंडेड का अर्थ नहीं समझा लेकिन बात उनको जँच गई। वह “चौथमल” नाम का अंतिम दिन था। उन्होंने आदेश दिया – “अच्छा तो बाजार में ढिंढ़ोरा पिटवा दो कि आज से जो कोई भी चौथमल को चौथमल कहेगा उसे कड़ी से कड़ी सजा दी जाएगी। चौथमल मर गया और आज से सी.एम. साहब नाम के नए शख्स का जन्म हुआ है।” उस दिन स्वयं अपने मुखारविंद से इतने सुंदर शब्दों को उच्चारित होते सुन चौथमल सॉरी सी.एम. साहब ने सोचा – “जो भी हो, प्रतिभा तो है मुझमें।”
उस रात देर तक ताजा-ताजा सी.एम. बने चौथमल को यह सोच-सोचकर नींद नहीं आई कि “अच्छा, तो मुख्यमंत्री के दफ्तर में मेरे बारे में भी बात होती है। सचमुच प्रतिभा तो है मुझमें।”

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