तेरापंथ सभा चुनाव : लोकतंत्र का उत्सव और समाज के भवनों की सच्चाई

प्रमोद तिवाड़ी

आगामी रविवार को गुवाहाटी की तेरापंथ सभा के चुनाव होने जा रहे हैं। चुनाव मैदान में रितेश खटेड़ और राजकुमार बैद आमने-सामने हैं। तकरीबन छह हजार मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग कर इनमें से किसी एक को आगामी दो वर्षों के लिए सभा का अध्यक्ष चुनेंगे। तेरापंथ सभा के चुनाव अध्यक्ष प्रणाली से होते हैं। चुनाव जीतने के बाद निर्वाचित अध्यक्ष अपनी पूरी टीम का गठन करता है।

हर वर्ष की तरह इस बार भी चुनाव को लेकर न केवल तेरापंथ समाज, बल्कि गुवाहाटी के समूचे मारवाड़ी समाज में उत्सुकता का माहौल है। दरअसल, तेरापंथ सभा का हर चुनाव किसी लोकतांत्रिक उत्सव से कम नहीं होता। यहां चुनाव पद प्राप्ति के माध्यम के साथ ही सामुदायिक सहभागिता का सार्वजनिक प्रदर्शन भी होता है।

चुनाव के पहले उम्मीदवार अपने पक्ष में माहौल बनाने के लिए हर संभव प्रयास करते हैं। एक समय था जब छोटे-छोटे समूह बनाकर घर-घर जाकर मतदाताओं से व्यक्तिगत संपर्क किया जाता था। गोठ-घुघरी का दौर चलता था। लोग घंटों बैठकर चर्चा करते थे। रिश्तों की गर्माहट प्रचार का हिस्सा होती थी। अब सोशल मीडिया के युग में प्रचार के तरीके बदल गए हैं।

हालांकि इस बार चुनावी माहौल में एक महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई दे रहा है। मुख्य चुनाव अधिकारी द्वारा जारी नई चुनाव आचार संहिता ने प्रचार के तौर-तरीकों को काफी हद तक सीमित कर दिया है।

नई नियमावली के अनुसार सोशल मीडिया, व्हाट्सऐप ग्रुप या अन्य माध्यमों पर किसी भी प्रकार के फ्लायर, विज्ञापन या प्रचार सामग्री के प्रसार पर रोक लगा दी गई है। अखबारों और न्यूज़ चैनलों में विज्ञापन, आलेख अथवा साक्षात्कार प्रकाशित करवाने पर भी प्रतिबंध लगाया गया है। सामूहिक भोज, मीटिंग, सभा, पोस्टर, बैनर, होर्डिंग, माइकिंग और वाहनों पर प्रचार सामग्री लगाने जैसी गतिविधियों को भी निषिद्ध कर दिया गया है। चुनाव प्रचार को मुख्य रूप से व्यक्तिगत संपर्क और टेलीफोन तक सीमित रखने का निर्देश दिया गया है।

इसके बावजूद फैंसी बाजार स्थित दुग्गड़ बिल्डिंग में अब भी हर शाम रौनक बनी रहती है। दोनों पक्षों ने वहीं अपने चुनावी कार्यालय बना रखे हैं। वहां रणनीतियां तैयार होती हैं। इस बात पर माथापच्ची होती है कि अधिक से अधिक मतदाताओं को घरों से निकालकर मतदान केंद्र तक कैसे पहुंचाया जाए। चाय-नाश्ते के दौर चलते रहते हैं। ओसवाल समाज स्वभाव से उत्सवधर्मी माना जाता है, लिहाजा वहां का माहौल किसी पारिवारिक मेले जैसा दिखाई देता है।

सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि इतनी तीखी प्रतिस्पर्धा के बावजूद दोनों पक्ष मर्यादा की एक लक्ष्मण रेखा बनाए रखते हैं। कमर के नीचे वार करने से बचा जाता है। व्यक्तिगत छींटाकशी बहुत कम देखने को मिलती है। पूरा चुनाव धर्मसंघ की मर्यादाओं और सामाजिक अनुशासन के भीतर चलता है। यही वह बात है जो इस चुनाव को अलग और सम्मानजनक पहचान देती है।

एक दौर था जब गुवाहाटी में तेरापंथ सभा के चुनाव बेहद धमाकेदार हुआ करते थे। उस दौर में वीआईपी ग्रुप और जनरल ग्रुप नाम के दो बड़े खेमे चर्चा में रहते थे। चुनावी माहौल कई-कई सप्ताह पहले से गर्म हो जाता था। साल 1992 या 93 में इन पंक्तियों के लेखक ने मारवाड़ी युवा मंच, गुवाहाटी शाखा के मंत्री पद पर रहते हुए तेरापंथ सभा के चुनाव करवाने में भूमिका निभाई थी। उस समय लालचंदजी सिंधी को चुनाव अधिकारी बनाया गया था। वह जमाना अलग था। प्रतिस्पर्धा अधिक तीखी थी। अब समय बदल चुका है। आज भी उत्साह है, पर पहले जैसा ध्रुवीकरण कम दिखाई देता है।

वैसे देखा जाए तो तेरापंथ सभा के अध्यक्ष और उनकी टीम का मुख्य काम तेरापंथ भवन की देखरेख तथा वहां संचालित धार्मिक और सामाजिक गतिविधियों की व्यवस्था करना होता है। सतही दृष्टि से देखने पर यह भूमिका बहुत साधारण प्रतीत हो सकती है, पर प्रवासी समाजों में सामुदायिक भवनों का महत्व अत्यंत गहरा होता है। यही वे केंद्र होते हैं, जहां से समाज की सामूहिक स्मृतियां, परंपराएं, धार्मिक गतिविधियां, संस्कार और सामाजिक संवाद संचालित होते हैं। सामुदायिक भवन केवल ईंट-पत्थर के ढांचे नहीं होते, वे सामाजिक शक्ति और सामूहिक पहचान के प्रतीक भी होते हैं।

यहीं आकर तेरापंथ सभा के चुनाव की सबसे बड़ी प्रासंगिकता सामने आती है। गुवाहाटी महानगर में ऐसे अनेक सामुदायिक भवन हैं, जिनका भाग्य तेरापंथ भवन जैसा नहीं है। वहां लोकतांत्रिक परंपराएं या तो पूरी तरह समाप्त हो गई है या फिर धीरे-धीरे कमजोर पड़ती जा रही हैं।

ऐसे अभागे भवनों की दो केटेगरियां हैं। इनमें से एक केटेगरी के भवनों पर ऐसे लोगों का एकाधिकार हो चुका है, जो स्वयं को स्थायी शासक मान बैठे हैं। उन्हें यह गलतफहमी है कि समाज चलाने का जन्मसिद्ध अधिकार उन्हीं के पास है। उनकी मानसिकता तानाशाही और सामंती होती है। वे लोकतंत्र और सहभागी व्यवस्था पर रत्ती भर विश्वास नहीं रखते। सारे निर्णय बंद कमरों में सीमित दायरे में लिए जाते हैं और विरोध की आवाज को दबा दिया जाता है। सबको साथ लेकर चलने की प्रवृत्ति उनके स्वभाव में नहीं होती। समाज उनके लिए साझी जिम्मेदारी न होकर निजी जागीर बन चुका है।

दूसरी केटेगरी में पड़ने वाले कुछ भवन ऐसे भी हैं, जहां स्थिति ठीक उलट है। वहां अराजकतावादी प्रवृत्तियों ने कब्जा जमा रखा है। वहां न कोई संस्थागत प्रक्रिया है, न अनुशासन और न ही पारदर्शिता। जिसका जो मन आता है, वह वैसा करता है। ऐसे लोग आत्ममुग्ध प्रवृत्ति के होते हैं। उन्हें किसी सामूहिक मर्यादा या जवाबदेही की चिंता नहीं रहती। यहां आर्थिक मामलों में भी गड़बड़झाला दिखाई देता है। इससे पूरी संस्थागत प्रक्रिया अव्यवस्था की भेंट चढ़ने लगती है।

दिलचस्प बात यह है कि इन दोनों तरह की विसंगतियों के कारण समाज के भीतर गहरा असंतोष है। लोग अंदर ही अंदर कुढ़ते हैं, आपस में शिकायतें भी करते हैं। पर अंततः वही निराशाजनक भाव हावी हो जाता है – “इन लोगों के मुंह कौन लगे!” परिणाम यह होता है कि धीरे-धीरे कुछ लोग पूरे संस्थागत ढांचे को बंधक बना लेते हैं और सामान्य समाज मूकदर्शक बनकर रह जाता है।

असल में, किसी भी प्रवासी समाज में सामुदायिक भवनों की भूमिका केवल धार्मिक गतिविधियों तक सीमित नहीं रहती। वे सामाजिक लोकतंत्र की प्रयोगशाला भी होते हैं। वहां समाज यह सीखता है कि असहमति के बावजूद साथ कैसे चला जाता है, नेतृत्व परिवर्तन कैसे होता है, जवाबदेही क्या होती है और सामूहिक निर्णय लेने की संस्कृति कैसे विकसित होती है।

तेरापंथ सभा का चुनाव इसलिए महत्वपूर्ण दिखाई देता है, क्योंकि वहां कम से कम यह संदेश जीवित है कि संस्था समाज की है, किसी व्यक्ति विशेष की नहीं। वहां मतदाता हैं, चुनाव है, संवाद है, प्रचार है, प्रतिस्पर्धा है और सबसे बढ़कर नेतृत्व परिवर्तन की स्वाभाविक व्यवस्था है।

लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबी यही होती है कि वह व्यक्ति को संस्था से बड़ा नहीं बनने देता। जहां चुनाव समाप्त हो जाते हैं, वहां धीरे-धीरे संस्थाएं कुछ व्यक्तियों की निजी जागीर में बदलने लगती हैं। और जहां अनुशासन समाप्त हो जाता है, वहां अराजकता संस्थागत संस्कृति को खा जाती है।

गुवाहाटी के मारवाड़ी समाज के लिए यह आत्ममंथन का सही समय है। वे तेरापंथ सभा के चुनाव को समाज के किसी एक घटक का चुनाव मानने के बजाय इससे एक बड़ा सामाजिक संदेश ग्रहण करें । समाज के सामुदायिक भवन तभी प्रासंगिक बने रह सकते हैं, जब उनमें लोकतांत्रिक मूल्य, पारदर्शिता और जवाबदेही बची रहे । अन्यथा, तानाशाही और अराजकता की यह दोहरी मार समाज को अंदर से खोखला करती रहेगी ।

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