‘मुख्यमंत्री का ब्राह्मण होना हमारे लिए दुर्भाग्यपूर्ण’: ब्राह्मण फ्रंट
थर्ड आई न्यूज
अखिल भारत ब्राह्मण फ्रंट ने हिमंत विश्व शर्मा पर समुदाय की उपेक्षा का लगाया आरोप
गुवाहाटी। अखिल भारत ब्राह्मण फ्रंट की असम राज्य समिति ने मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा पर ब्राह्मण समुदाय के प्रति पर्याप्त सहयोग नहीं देने का आरोप लगाया है। संगठन ने कहा कि मुख्यमंत्री स्वयं ब्राह्मण समुदाय से होने के बावजूद समुदाय के हितों के लिए अपेक्षित कदम नहीं उठाए गए हैं।
गुवाहाटी प्रेस क्लब में आयोजित संवाददाता सम्मेलन में संगठन के प्रतिनिधियों ने कहा कि मुख्यमंत्री का ब्राह्मण समुदाय से होना और इसके बावजूद समुदाय को पर्याप्त सहयोग नहीं मिलना उनके लिए “दुर्भाग्यपूर्ण” है।
फ्रंट ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री ब्राह्मण समाज द्वारा आयोजित बैठकों और कार्यक्रमों में शामिल नहीं होते हैं। संगठन ने यह भी दावा किया कि असम में ब्राह्मण विकास परिषद के गठन की दिशा में भी अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।
संवाददाता सम्मेलन में यूजीसी के नियमों तथा असम भूमि एवं राजस्व विनियमन (संशोधन) विधेयक, 2026 को लेकर भी आपत्तियां जताई गईं।
भूमि विधेयक पर ब्राह्मण फ्रंट ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि इसके प्रावधानों का असर मूलनिवासी लोगों, जनजातीय समुदायों और सामान्य किसानों पर पड़ सकता है। संगठन ने आशंका जताई कि इसके कारण लोगों को अपनी जमीन से बेदखल होने या जमीन तक पहुंच खोने की स्थिति का सामना करना पड़ सकता है।
फ्रंट ने यह भी आरोप लगाया कि विधेयक के कुछ प्रावधानों से संपन्न व्यक्तियों और बड़ी कंपनियों के लिए जमीन हासिल करना आसान हो सकता है, जिससे स्थानीय लोगों की आजीविका प्रभावित होने का खतरा है। संगठन ने सरकार से आग्रह किया कि जनता और किसान संगठनों के साथ चर्चा किए बिना ऐसे फैसले नहीं लिए जाएं।
उच्च शिक्षा के मुद्दे पर संगठन ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के बढ़ते हस्तक्षेप का विरोध किया। फ्रंट का कहना है कि इससे असम के राज्य विश्वविद्यालयों की स्थानीय जरूरतों के अनुरूप निर्णय लेने की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।
संगठन ने शिक्षा के बढ़ते व्यावसायीकरण और फीस में वृद्धि को रोकने के लिए भी कदम उठाने की मांग की। फ्रंट ने कहा कि आर्थिक रूप से कमजोर लेकिन मेधावी विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा प्राप्त करने के अवसर से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।
इसके अलावा संगठन ने शिक्षक भर्ती तथा विश्वविद्यालय और विद्यालयों के पाठ्यक्रम तैयार करने में स्थानीय भाषाओं, स्वदेशी संस्कृति और आरक्षण नीतियों के उचित संरक्षण की भी मांग की।

