‘मेघधरा में मारवाड़’ : संगठन, संस्कार और सामाजिक सरोकारों का संगम

रमेश कुमार चांडक

शिलांग में 5 एवं 6 सितम्बर को आयोजित पूर्वोत्तर प्रादेशिक मारवाड़ी सम्मेलन की पंचम प्रांतीय कार्यकारिणी सभा कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण रही। ‘मेघधरा में मारवाड़’ की अवधारणा के साथ आयोजित दो दिवसीय लघु अधिवेशन में पूर्वोत्तर के विभिन्न क्षेत्रों से 150 से अधिक प्रतिनिधियों एवं अतिथियों की सहभागिता ने संगठन की व्यापकता और सक्रियता का परिचय दिया। संगठनात्मक विचार-विमर्श के साथ प्रशिक्षण, संस्कृति, सेवा, महिला सशक्तिकरण, नई पीढ़ी की भागीदारी और सामाजिक सरोकार इस आयोजन के केंद्र में रहे।

अधिवेशन के प्रथम दिन आयोजित प्रांतीय प्रशिक्षण कार्यशाला ‘सारथी’ एक महत्वपूर्ण पहल साबित हुई। प्रांतीय प्रशिक्षण कार्यशाला संयोजक विमल अग्रवाल ने सम्मेलन के 90 वर्षों के इतिहास, संगठनात्मक संरचना, संविधान, सदस्यता और कार्यप्रणाली की जानकारी दी। अंतरराष्ट्रीय संस्था JCI के प्रमाणित प्रशिक्षक के रूप में मुझे बैठक संचालन, प्रोटोकॉल और प्रभावी सभा संचालन से जुड़े व्यावहारिक पक्षों पर संवाद करने का अवसर मिला। कार्यशाला को मिली सकारात्मक प्रतिक्रिया उत्साहवर्धक रही। कई शाखाओं ने अपने क्षेत्रों में भी ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने की इच्छा व्यक्त की है।

संगठन जितना महत्वपूर्ण है, अपनी संस्कृति और जड़ों से जुड़ाव भी उतना ही आवश्यक है। इसी भावना की सुंदर अभिव्यक्ति प्रथम दिवस की राजस्थानी सांस्कृतिक संध्या में देखने को मिली। शिलांग की बालिकाओं और महिलाओं ने राजस्थानी संस्कृति पर आधारित प्रस्तुतियों से समां बांध दिया। प्रतिभा शर्मा ने कार्यक्रम का संचालन किया। निर्मला कमल अलमपुरिया और गुवाहाटी महिला शाखा अध्यक्ष संतोष शर्मा के राजस्थानी लोकगीतों तथा गुवाहाटी शाखा अध्यक्ष शंकर बिड़ला एवं उनके साथियों की चंग की थाप पर प्रस्तुत राजस्थानी फाग ने ‘मेघधरा में मारवाड़’ की अवधारणा को साकार कर दिया।

दूसरे दिन का उद्घाटन सत्र भी आत्मीयता और गरिमा से परिपूर्ण रहा। शिलांग शाखा अध्यक्ष अनिल बजाज और स्वागताध्यक्ष महेश चाचन ने प्रतिनिधियों का स्वागत किया। शिलांग महिला शाखा की सदस्याओं ने पारंपरिक कुंकुम तिलक और मोती की माला से बाहर से आए प्रतिनिधियों का अभिनंदन किया। राष्ट्रीय संगठन मंत्री बसंत सुराणा, प्रांतीय सलाहकारों, पूर्व पदाधिकारियों और विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान देने वाले समाजबंधुओं का सम्मान किया गया।

प्रांतीय अध्यक्ष कैलाश काबरा ने अपने प्रेरणादायी संबोधन में संगठन की एकता, सामूहिक उत्तरदायित्व और सक्रिय सहभागिता पर विशेष बल दिया। निवर्तमान अध्यक्ष ओमप्रकाश खंडेलवाल और राष्ट्रीय संगठन मंत्री बसंत सुराणा सहित अन्य वक्ताओं के विचारों ने भी संगठन की भावी दिशा को लेकर महत्वपूर्ण संदेश दिए।

ऊपरी असम में आई बाढ़ के दौरान सम्मेलन की शाखाओं और समाजबंधुओं द्वारा किए गए राहत एवं सेवा कार्य हमारे लिए विशेष संतोष का विषय हैं। कठिन समय में समाज के कार्यकर्ता जिस तत्परता से प्रभावित लोगों के बीच पहुंचे, वह सम्मेलन की सेवा भावना का प्रमाण है। इस अवसर पर राहत कार्यों में अग्रणी भूमिका निभाने वाले कार्यकर्ताओं का अभिनंदन किया गया। सम्मेलन समाचार के डिजिटल अंक का विमोचन भी इसी सत्र में हुआ।

कार्यकारिणी बैठक में संगठनात्मक प्रगति, प्रांतीय महामंत्री प्रतिवेदन, कोष, विभिन्न मंडलों और प्रांतीय संयोजकों की रिपोर्ट सहित अनेक विषयों पर विस्तार से विचार हुआ। दो नवगठित शाखाओं को स्थापना प्रमाण पत्र दिए गए। महिला छात्रावास, प्रशिक्षण कार्यशालाओं, संस्कारशाला, दीपावली के अवसर पर शाखाओं को सुदृढ़ करने तथा ‘भाग्यशाली दानपत्र योजना’ सहित विभिन्न योजनाओं पर चर्चा हुई।

प्रांतीय संयुक्त मंत्री के रिक्त दायित्व का अतिरिक्त कार्यभार पवन कुमार मोर को दिया गया। शिलांग महिला शाखा की पूर्व अध्यक्ष डोली अग्रवाल को प्रांतीय कार्यकारिणी सदस्य के रूप में शामिल किया गया। टियोक शाखा सचिव को प्रांतीय संयोजक-सोशल मीडिया का अतिरिक्त दायित्व सौंपा गया।

बदलते समय के साथ संगठन को बदलने का संदेश :
कार्यकारिणी सभा में पूर्व प्रांतीय महामंत्री प्रमोद तिवाड़ी का संबोधन विशेष रूप से विचारोत्तेजक रहा। उन्होंने संगठन के सामने उपस्थित वर्तमान और भावी चुनौतियों पर चर्चा करते हुए कहा कि किसी सामाजिक संगठन की शक्ति उसके पदाधिकारियों की संख्या से नहीं, समाज के साथ उसके जीवंत संबंध और उपयोगिता से तय होती है। समय के साथ समाज की आवश्यकताएं बदली हैं, इसलिए संगठन को भी अपनी कार्यशैली, प्राथमिकताओं और कार्यक्रमों में समयानुकूल बदलाव करना होगा।

प्रमोद तिवाड़ी ने संगठन में आपसी समन्वय और संवाद को मजबूत करने के साथ महिलाओं और नई पीढ़ी की भागीदारी बढ़ाने पर विशेष जोर दिया। उनका कहना था कि युवा पीढ़ी को संगठन से जोड़ने के लिए उन्हें महज कार्यक्रमों में उपस्थित होने का आग्रह पर्याप्त नहीं होगा। युवाओं की रुचि, प्रतिभा और सोच के अनुरूप उन्हें जिम्मेदारी, मंच और निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी देनी होगी। समाज की प्रतिभाओं, विद्वानों, लेखकों, शोधकर्ताओं, उद्यमियों और विभिन्न क्षेत्रों में विशिष्ट उपलब्धि हासिल करने वाले लोगों को पहचानना तथा सम्मानित करना भी संगठन की प्राथमिकताओं में शामिल होना चाहिए।

उन्होंने समाज द्वारा दशकों से किए जा रहे सेवा कार्यों के व्यवस्थित दस्तावेजीकरण की आवश्यकता रेखांकित की। पूर्वोत्तर में मारवाड़ी समाज ने शिक्षा, स्वास्थ्य, धर्मार्थ संस्थाओं, गौसेवा, आपदा राहत और जनकल्याण के अनेक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है, लेकिन इसका समग्र और प्रामाणिक दस्तावेज उपलब्ध नहीं है। इस इतिहास को संकलित करना वर्तमान पीढ़ी के साथ आने वाली पीढ़ियों के लिए भी आवश्यक है।

समाज में वैवाहिक संबंधों से जुड़ी बढ़ती चुनौतियों का उल्लेख करते हुए प्रमोद तिवाड़ी ने इस दिशा में संगठन को अधिक सक्रिय और व्यावहारिक भूमिका निभाने का सुझाव दिया। सामाजिक रिश्तों को मजबूत बनाने और परिवारों के बीच संवाद बढ़ाने के लिए आधुनिक तकनीक तथा संगठनात्मक नेटवर्क के बेहतर उपयोग पर भी उन्होंने बल दिया।

‘हर घर सम्मेलन—घर घर सम्मेलन’ अभियान को संगठन के विस्तार का प्रभावी माध्यम बताते हुए उन्होंने कहा कि सम्मेलन को समाज के प्रत्येक परिवार तक पहुंचाने का प्रयास होना चाहिए। सदस्यता को आंकड़ों तक सीमित रखने के बजाय परिवारों के साथ सतत संपर्क और संवाद स्थापित करना आवश्यक है।

संस्कारशाला के संबंध में उनका दृष्टिकोण भी व्यापक रहा। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी को संस्कार देने का अर्थ उसे अतीत तक सीमित रखना नहीं है। संस्कारशाला में सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों के साथ वैज्ञानिक दृष्टिकोण, स्वतंत्र चिंतन, प्रश्न पूछने की प्रवृत्ति, नवाचार, नेतृत्व क्षमता और सामाजिक उत्तरदायित्व को भी स्थान मिलना चाहिए। नई पीढ़ी अपनी जड़ों को समझे और आधुनिक दुनिया के साथ आत्मविश्वास से आगे बढ़े, संस्कारशाला का स्वरूप इसी उद्देश्य के अनुरूप विकसित होना चाहिए।

आगामी जनगणना के संदर्भ में भी प्रमोद तिवाड़ी ने समाज के सामने पहचान से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय रखा। उन्होंने आग्रह किया कि जनगणना में जाति, धर्म और मातृभाषा से संबंधित जानकारी भावनाओं अथवा किसी तात्कालिक आग्रह के आधार पर दर्ज कराने के बजाय अपनी वास्तविक सामाजिक, धार्मिक और भाषायी पहचान के अनुरूप दी जाए। सही जानकारी समाज और देश, दोनों के लिए उपयोगी होती है।

उनके संबोधन के बाद प्रांत की ओर से आतिथ्य शाखा शिलांग, शिलांग महिला शाखा और मारवाड़ी युवा मंच के समर्पित सेवादार कार्यकर्ताओं का विशेष अभिनंदन किया गया। पूरे आयोजन में इन कार्यकर्ताओं का अनुशासन, सेवा भाव और आत्मीयता उल्लेखनीय रही।

महिला छात्रावास निर्माण की दिशा में भी महत्वपूर्ण निर्णय हुआ। एक लाख रुपये अथवा उससे अधिक सहयोग देने वाले समाजबंधुओं एवं शाखाओं के नाम छात्रावास में अंकित किए जाएंगे। किशनलाल नाहटा, संजय मोर और अनोप चंद सेठिया ने इस अवसर पर एक-एक लाख रुपये के सहयोग की घोषणा की।

राष्ट्रीय संगठन से प्राप्त आपदा राहत राशि में से तीन लाख रुपये असम मुख्यमंत्री राहत कोष में देने का निर्णय लिया गया। शाखाओं से उनके द्वारा किए गए बाढ़ राहत कार्यों का विवरण भी मांगा गया है। इससे समाज के सेवा कार्यों का व्यवस्थित दस्तावेज तैयार किया जा सकेगा।

आगामी कार्यक्रमों की रूपरेखा भी तय की गई। जनवरी-फरवरी 2027 में राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक गुवाहाटी में आयोजित करने का निर्णय लिया गया। अगली प्रांतीय कार्यकारिणी सभा माजुली नदी द्वीप में आयोजित करने के माजुली शाखा के आतिथ्य प्रस्ताव को भी स्वीकृति प्रदान की गई।

अधिवेशन में महिला प्रतिनिधियों के लिए मारवाड़ी युवा मंच और शिलांग महिला शाखा ने मनोरंजन एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए। बाहर से आई महिला प्रतिनिधियों के लिए शिलांग शाखा ने निःशुल्क आवास की व्यवस्था की। विदाई के समय प्रतिनिधियों को मेघालय के स्थानीय स्मृति-चिह्न और उत्पाद भेंट करना आतिथ्य की आत्मीयता को और बढ़ा गया।

आयोजन संयोजक महेश चाचन और सह संयोजक अजय अग्रवाल के नेतृत्व में शिलांग शाखा, शिलांग महिला शाखा, मारवाड़ी युवा मंच और आयोजन से जुड़े सभी कार्यकर्ताओं ने जिस समर्पण से दायित्व निभाया, वह प्रशंसनीय है। सुंदर व्यवस्था और आत्मीय आतिथ्य ने प्रत्येक प्रतिनिधि को प्रभावित किया।

‘मेघधरा में मारवाड़’ मेरे लिए एक कार्यकारिणी सभा अथवा दो दिवसीय आयोजन भर नहीं था। यह अपनी जड़ों से जुड़े रहते हुए भविष्य की ओर देखने का अवसर था। प्रशिक्षण ने संगठनात्मक दक्षता की आवश्यकता सामने रखी, सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने हमारी विरासत से जोड़ा, सेवा कार्यों ने सामाजिक उत्तरदायित्व का बोध कराया और कार्यकारिणी की चर्चा ने आने वाले समय की दिशा निर्धारित की।

शिलांग से लौटते समय सबसे महत्वपूर्ण अनुभूति यही रही कि पूर्वोत्तर का मारवाड़ी समाज अपनी सांस्कृतिक पहचान को संजोते हुए स्थानीय समाज के साथ गहरे आत्मीय संबंधों और सेवा भावना के साथ आगे बढ़ रहा है। सम्मेलन की जिम्मेदारी इस सामाजिक ऊर्जा को जोड़ने, नई पीढ़ी तक पहुंचाने और उसे रचनात्मक दिशा देने की है। ‘मेघधरा में मारवाड़’ ने इस दिशा में एक मजबूत और सार्थक कदम बढ़ाया है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *