डाक्टर चौथमल

विनोद रिंगानिया

शर्मा जल्दी-जल्दी डग भरते हुए सीएम बाबू के दफ्तर में घुस गया। उसके दिमाग के अंदर आज एक धांसू आइडिया आ रखा है और इसी आइडिया ने उसके पूरी बदन में स्फूर्ति ला दी है। सीएम बाबू अपनी कुर्सी पर बैठे थे, हमेशा की तरह। एक अखबार पर आंखें गड़ाए हुए थे। शर्मा को देखते ही प्रश्न दाग दिया – “अरे शर्मा, एक बात बता। बाद की उमर में भी डाक्टर बन सकै है कै।”
“बाद की उमर माने?”
“माने अपने सामने वाले पनवाड़ी की दुकान पर आज मैंने देखा कि उसने नई नेमप्लेट लगा रखी है, डाक्टर मोहन लाल चौरसिया। मुझे ये समझ में नहीं आता कि जब डाक्टर हो गया तो अब पान बेचने की क्या जरूरत है?”
“ओ, आप उसकी बात कर रहे हैं? वो, वो वाला डाक्टर नहीं है?”
“कौन-सा डाक्टर नहीं है। एलोपैथिक नहीं होगा, तो होम्योपैथिक होगा, नहीं तो आयुर्वेदिक होगा। लोगों का इलाज तो करता होगा – सच्चा, झूठा?”
“नहीं बाबू। यह साहित्य वाला डाक्टर होता है।”
शर्मा को आज यकीन हो गया कि टेलीपैथी भी कोई चीज है। उसने अपनी तर्जनी में पहन रखी पुखराज जड़ी अंगुठी को माथे से लगाया। आज सुबह ही शर्मा को यह विचार कौंधा था कि सीएम बाबू को डाक्टरेट करवाए बिना उसकी बेटी का कालेज में एडमिशन होने वाला नहीं है। रामसेवक जी की तरह छोटे-मोटे कविता संग्रह जैसी स्कीमों से उसका घर चलने वाला नहीं है। उसे कोई बड़ी स्कीम चाहिए और चमत्कारी अंगुठी की कृपा से आज सुबह ही उसके दिमाग में इस विचार ने प्रवेश किया। चमत्कार को न मानने वाले न माने, लेकिन इसे आप क्या कहेंगे कि इधर उसके दिमाग में यह विचार आया और इधर बाबू भी खुद ही अपनी ओर से इसके बारे में पूछने लगे हैं। अब तो बाबू को डाक्टरेट करवा कर ही छोड़ेंगे।
“क्या सोचने लग गए शर्मा? साहित्य के डाक्टर की बात बता रहे थे न? क्या साहित्य को भी बीमारियां होती हैं?”
“नहीं बाबू। ऐसे डाक्टरों का इलाज से कोई लेना-देना नहीं होता। वे कोई इलाज नहीं जानते, बल्कि डिग्री लेने के बाद खुद उन्हें कई गंभीर बीमारियां लग जाती हैं।”
“यार शर्मा, तुम बातों को उलझाते बहुत हो। सीधे-सीधे समझाओ तो बात कुछ पल्ले पड़े।”
“वही कर रहा हूँ बाबू।” शर्मा ने सोचा कि अभी लोहा गरम है, बस हथोड़े की चोट की जरूरत है। बात को जल्दी से साफ-साफ बता देना अच्छा है, खासकर रामसेवक जी के आने से पहले।
“ऐसा है बाबू, अब तक आपने चौरसिया में क्या देखा? यही न कि, बेचारा अपनी रोजी-रोटी कमा रहा है, सबसे विनम्रता के साथ बात करता है। है न…अब कल से आप क्या देखेंगे कि उसे डाक्टर साहब कहकर नहीं पुकारने वाले को वो पान सबसे बाद में देगा। और जो उसे डाक्टर साब कहेगा हो सकता है उससे पैसे ही नहीं ले।”
“अरे यार शर्मा…तुमने अभी तक यह नहीं बताया कि यह चौरसिया आखिर डाक्टर बण्या कैसे, यह कैसी डाक्टरी है जिसके लिए पढ़ाई नहीं करनी पड़ती? मैंने तो उसे हमेशा इस दुकान पर पान बेचते ही देखा है।”
“उसी पर आ रहा हूं बाबू। धीरज रखिए। इस साहित्य के डाक्टर को पी एच डी भी कहते हैं। इसे कोई भी खरीद सकता है।”
“अच्छा? इससे क्या फायदा होता है?”
“वैसे तो फायदा कुछ नहीं है, और दूसरी ओर से देखें तो बहुत फायदा है।”
“देखिए पढ़ाई-लिखाई करना एक बड़ा सिरदर्दी का काम है यह तो आप मानेंगे।”
“हां, सो तो है। मैं तो मैट्रिक भी नहीं कर पाया।”
“जबकि पढ़े-लिखे आदमी की एक इज्जत होती है। आपको पता है यह डाक्टर की डिग्री कितनी ऊंची होती है? बीए के बाद एमए। और एमए के बाद पीएचडी। उसमें भी आपको तीन साल लग सकते हैं, पांच साल लग सकते हैं, कोई ठिकाना नहीं है। और वैसी डिग्री आपको लाख-दो लाख रुपए में मिल जाए, तो और क्या चाहिए? जो लोग चौरसिया को नहीं जानते वे लोग तो धीरे-धीरे इसे विद्वान समझने लगेंगे न। हो सकता है, कुछ दिनों के बाद टीवी वाले एक न्यूज ही बना दें कि डाक्टरेट किया हुआ विद्वान पान बेचता है।”
“यार शर्मा, ये तो तूने भली सुझाई। कोई जुगाड़ बैठा अपने लिए भी। लाख दो लाख तो तुम लोग ही कोई न कोई बहाना बनाकर ले जाते हो मुझसे। जबकि यह तो एक सॉलिड काम हो जाएगा। अभी मैं कहीं जाता हूँ तो लोग अय बणिया, अय बणिया कहकर बड़ी ही हिकारत दिखाते हैं। यह डिग्री गले में लटकी रहेगी तो उनमें से कुछ लोग तो सम्मान देंगे। इस डाक्टर की डिग्री की दुकान कहां है। मैं उस चक्रवर्ती मैनेजर को भेजकर एक मंगवा लेता हूं।”
“अरे बाबू, आप भी न। इसकी दुकान नहीं होती यह यूनिवर्सिटी से मिलती है।”
“हां, तो यूनिभ्रष्टी से मंगवा लेता हूँ उसमें क्या है।…मिंकी…मिंकी।” सीएम बाबू ऑफिस में घुस आई अपनी बिल्ली को अपने पास बुलाने लगते हैं। फिर उसे गोद में लेते हुए कहते हैं, “हां, तो क्या विचार है भेज दूं तो अपने चक्रवर्ती सम्राट को यूनीभ्रष्टी?”
“आप समझने की कोशिश कीजिए सीएम बाबू। यह कोई जलेबी, समोसे की दुकान नहीं है।”
“तो क्या वहां पहले से ऑर्डर देना पड़ता है?”
“अरे, आपको कैसे समझाऊं। इसमें वीसी या एचओडी के साथ गुपचुप में बात करनी पड़ेगी।”
“गुपचुप में बात? इसमें भी कच्चा-पक्का होता है क्या? अरे तो होता भी है तो उसमें क्या है? अपना चक्रवर्ती लेन-देन की बात करने में बड़ा होशियार है। अपने सप्लाई के एचओडी, जीएसटी के एचओडी – सबके साथ वही बात करता है। मैं खुद कहीं नहीं जाता।”
शर्मा सोचता है कैसे समझाया जाए। फिर वह कहता है – “छोड़िए चक्रवर्ती-सक्रवर्ती को, यह सब आप मुझ पर छोड़ दीजिए। मैं इंडिया की अच्छी से अच्छी यूनिवर्सिटी से आपको पीएचडी दिलाउंगा। यह थोड़ी ट्रिकी चीज है, आपको चक्रवर्ती नहीं कर पाएगा।”
“ठीक है, ठीक है, जैसा उचित समझो। जब पैसे देने हो बता देना…सीएम बाबू ने अपनी मिंकी की पीठ के रोओं पर हाथ फेरते हुए कहा। हाँ एक बात और। एक कोई छोटी-मोटी पीएचडी अपनी मिंकी को भी दिला देना न। यही कोई पच्चीस-तीस हजार की।”

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