असम में हिमंत का जलवा बरकरार, कट्टर हिंदुत्ववादी छवि से बने केंद्रीय नेतृत्व के दुलारे, मुख्यमंत्री पद के अहम दावेदार

थर्ड आई न्यूज

गुवाहाटी I असम में एक बार फिर भाजपा रुझानों में सरकार बनाती दिख रही है। ताजा रुझानों के मुताबिक,126 सीट वाली असम विधानसभा में भाजपा अपने दम पर ही बहुमत का आंकड़ा पार कर गई है, जबकि उसके मुकाबले कांग्रेस काफी पीछे छूट गई। भाजपा की इस जीत का शिल्पकार राज्य के मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा को बताया जा रहा है। हालांकि, यह पहली बार नहीं है जब हिमंत ने असम में भाजपा का झंडा बुलंद करने की जिम्मेदारी संभाली और उसे अंजाम तक पहुंचाया। वह ये काम 2016 से ही करते आ रहे हैं। यह बात अलग है कि उन्हें मुख्यमंत्री बनने का पहला मौका 2021 में मिला था।

ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर हिमंत विश्व शर्मा कौन हैं? उनका शुरुआती जीवन और सियासी करियर कैसा रहा है? उनके कांग्रेस से मोहभंग और इसके बाद भाजपा में आने की कहानी क्या है? कैसे हिमंत ने भाजपा में अपनी पहचान और पहुंच तेजी से बढ़ाई है? आइये जानते हैं…

हिमंत विश्व शर्मा कौन हैं?
हिमंत विश्व शर्मा का जन्म 1 फरवरी 1969 को असम के जोरहाट में हुआ था। बाद में उनका परिवार गुवाहाटी के उलुबाड़ी और गांधीबस्ती इलाके में बस गया। उनका परिवार मूल रूप से नलबाड़ी जिले के लतीमा से ताल्लुक रखता है और उनके छह भाई-बहन हैं। राजनीति में औपचारिक रूप से प्रवेश करने से पहले का उनका सफर शिक्षा, छात्र नेतृत्व और वकालत से जुड़ा रहा है।

  1. राजनीति में आने से पहले कैसा था जीवन?
    हिमंत ने अपनी स्कूली शिक्षा 1985 में गुवाहाटी के कामरूप अकादमी स्कूल से पूरी की। स्कूली शिक्षा के बाद उन्होंने 1985 में प्रतिष्ठित कॉटन कॉलेज (अब कॉटन यूनिवर्सिटी) में दाखिला लिया। यहां से उन्होंने 1990 में राजनीति विज्ञान में स्नातक और 1992 में इसी विषय में परास्नातक की डिग्री हासिल की। इसके बाद उन्होंने बीआरएम गवर्मेंट लॉ कॉलेज गुवाहाटी से एलएलबी की पढ़ाई की। इसके कई साल बाद 2006 में उन्होंने गुवाहाटी विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में नॉर्थ ईस्टर्न काउंसिल: ए स्ट्रक्चरल एंड फंक्शनल एनालिसिस विषय पर अपनी पीएचडी पूरी की।
  2. कैसा रहा हिमंत का पेशेवर करियर?
    राजनीति के साथ-साथ उन्होंने कानून के क्षेत्र में भी अपना करियर बनाया। 1995 में वे सॉलिसिटर बने और उन्होंने 1996 से लेकर 2001 तक गुवाहाटी हाईकोर्ट में वकालत की।
  3. कैसे राजनीति से जुड़े हिमंत?
    हिमंत विश्व शर्मा मुख्यधारा की राजनीति में जगह बनाने से पहले छात्र राजनीति में आए और यहां अपनी प्रभावशाली शुरुआत के जरिए छा गए। बताया जाता है कि अपने बेहतरीन भाषण कौशल और रणनीतिक समझ की वजह से वे प्रभावशाली ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू) के सदस्य बन गए। स्कूली छात्र होने के दौरान ही वे कॉटन कॉलेज में आसू के मुख्य कार्यालय में नियमित रूप से जाया करते थे।

1987 में, 18 साल की उम्र में डिग्री के प्रथम वर्ष के छात्र के रूप में उन्हें कॉटन कॉलेज का सहायक महासचिव चुना गया। चुनाव में समर्थन जुटाने के लिए वे उसी साल से कॉलेज हॉस्टल में रहने लगे थे। उन्होंने छात्र राजनीति में अपनी गहरी पैठ बनाई और वे 1988-89, 1989-90 और 1991-92 में तीन बार कॉटन कॉलेज छात्र संघ के महासचिव चुने गए। शर्मा आसू से जुड़े ऑल गुवाहाटी स्टूडेंट्स यूनियन के महासचिव भी रहे।

आसू के एक युवा नेता के रूप में उनकी क्षमता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने एक फुटबॉल स्टेडियम के निर्माण के लिए धन जुटाने के लिए छात्रों के एक प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करते हुए दिल्ली का दौरा किया था। वहां उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी से मुलाकात कर स्टेडियम के लिए फंड मंजूर करवाया था।

कैसे राजनीति में उतरे हिमंत विश्व शर्मा ?

  1. 1991 के आसपास छात्र संगठन आसू के साथ शर्मा के गहरे मतभेद हो गए और उन्होंने अपना रास्ता बदल लिया। इसी दौरान तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री हितेश्वर सैकिया असम आंदोलन के बाद युवाओं और छात्रों के बीच कांग्रेस की पैठ बनाने की कोशिश कर रहे थे, जिसके लिए उनकी नजर शर्मा पर पड़ी। शर्मा ने राज्य भर के छात्रों और कॉलेज यूनियनों के साथ संपर्क बनाकर कांग्रेस को स्थापित करने में सैकिया की काफी मदद की। इसके चलते वे सैकिया के सबसे करीबी युवा नेताओं में शामिल हो गए।

यहीं से मुख्यधारा की राजनीति में हिमंत के लिए रास्ता खुला। 1996 में उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर जालुकबाड़ी सीट से अपना पहला विधानसभा चुनाव लड़ा। वे इस चुनाव में हार गए थे। 2001 में उन्होंने जालुकबाड़ी निर्वाचन क्षेत्र से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा और अपने पूर्व गुरु और दिग्गज नेता भृगु कुमार फुकन को हराकर पहली बार विधायक बने। इसके बाद वे 2006 और 2011 में भी अपने मतों का अंतर बढ़ाते हुए लगातार जीत दर्ज करते रहे।

  1. तरुण गोगोई के कार्यकाल में बने शक्तिशाली नेता :
    मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के कार्यकाल (2002 से 2014) के दौरान, शर्मा कांग्रेस सरकार के सबसे शक्तिशाली मंत्रियों में से एक बन गए। शुरुआत में उन्हें योजना और विकास विभाग दिया गया था, जिसे उन्होंने राज्य के अहम विभागों में बदल दिया। इसके अलावा उन्हें कृषि, वित्त, स्वास्थ्य, शिक्षा, लोक निर्माण (पीडब्ल्यूडी) और असम समझौते के क्रियान्वयन जैसे कई अहम विभागों की जिम्मेदारी दी गई।

शर्मा के करीबियों के हवाले से एक अखबार ने कुछ समय पहले बताया था कि राजनीति के शुरुआती दिनों में एक प्रशासक के रूप में हिमंत बहुत मेहनती थे और देर रात तक फाइलों पर काम करने तथा बारीकियों पर ध्यान देने के लिए जाने जाते थे। खासकर 2006 से स्वास्थ्य मंत्री और 2011 से शिक्षा मंत्री के तौर पर उन्होंने राज्य में तीन नए मेडिकल कॉलेजों (जोरहाट, बारपेटा और तेजपुर) का निर्माण करवाया और पांच अन्य (डिफू, नगांव, धुबरी, उत्तरी लखीमपुर और कोकराझार) की आधारशिला रखी।

  1. पार्टी के रणनीतिकार के तौर पर बनाई पहचान :
    अपनी मेहनत के दम पर हिमंत कुछ समय में ही तरुण गोगोई के चहेते बन गए थे। असम में शर्मा ने कांग्रेस के लिए एक अहम रणनीतिकार और मुश्किल स्थितियों से पार्टी को निकालने वाले नेता की छवि स्थापित की। उन्होंने 2006 और 2011 के असम विधानसभा चुनावों में पार्टी के अभियान का सफलतापूर्वक प्रबंधन किया और पूर्वोत्तर में पार्टी की जड़ें मजबूत कीं।

कांग्रेस को छोड़कर भाजपा का दामन थामने की क्या कहानी?
कांग्रेस में शर्मा का पतन 2011 के आसपास शुरू हुआ। दरअसल, शर्मा युवा विधायकों का एक गुट बनाकर मुख्यमंत्री पद के प्रबल आकांक्षी बन गए थे। दूसरी ओर, तरुण गोगोई अपने बेटे गौरव गोगोई को अपने राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में बढ़ावा देने लगे, जिससे दोनों के बीच गहरी दरार आ गई।

आखिरकार जुलाई 2014 में सरमा ने कांग्रेस के 79 में से 52 विधायकों के समर्थन का दावा किया था। 2015 में असम चुनावों की रणनीति और नेतृत्व के मुद्दे पर उन्होंने राहुल गांधी से मुलाकात की थी। शर्मा ने कई मौकों पर इंटरव्यू और बयानों में बताया है कि उस अहम बैठक के दौरान राहुल गांधी ने उनकी बातों को नजरअंदाज किया और वे अपने पालतू कुत्ते पिदी को बिस्किट खिलाने में व्यस्त रहे। शर्मा के मुताबिक, जब राहुल गांधी की तरफ से मुख्यमंत्री पद के उनके दावे को खारिज कर दिया गया तो उन्होंने तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को एक कड़ा पत्र भी लिखा था।

आखिरकार कांग्रेस में अपनी सुनवाई न होने के बाद उन्होंने जुलाई 2014 में अपने मंत्री पदों से इस्तीफा दे दिया। 2015 में हिमंत ने विधानसभा की सदस्यता छोड़ी। 23 अगस्त 2015 को वे नई दिल्ली में अमित शाह के आवास पर आधिकारिक तौर पर भाजपा में शामिल हो गए। यह वह दौर था, जब भाजपा अमित शाह के नेतृत्व में पूर्वोत्तर राज्यों में अपनी जड़ें जमाने की कोशिश कर रही थी, लेकिन पार्टी के पास वहां मजबूत स्थानीय नेतृत्व और जमीनी पकड़ का अभाव था। शर्मा ने इस खालीपन को पूरी तरह से भर दिया। शर्मा की कड़ी मेहनत करने की क्षमता और जमीनी स्तर पर उनके मजबूत नेटवर्क ने अमित शाह को बहुत प्रभावित किया। भाजपा में आते ही उन्हें चुनाव प्रबंधन समिति का संयोजक नियुक्त किया गया।

भाजपा में कैसा रहा है हिमंत का सियासी सफर?
2016 के असम विधानसभा चुनावों में शर्मा ने एक प्रमुख रणनीतिकार की भूमिका निभाई, जिससे राज्य में पहली बार भाजपा की सरकार बनी। सर्वानंद सोनोवाल के मुख्यमंत्री बनने पर शर्मा ने अहम मंत्रालयों का प्रभार संभाला। साथ ही, उन्हें पूर्वोत्तर में भाजपा के गठबंधन- नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस (नेडा) का संयोजक बनाया गया, और उनकी मदद से भाजपा ने अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर और मेघालय जैसे राज्यों में भी अपनी सरकारें बनाईं। यानी 2016 के बाद के पांच वर्षों में वे सरकार में ‘नंबर 2’ होते हुए भी सबसे शक्तिशाली नेता बने रहे।

2021 में असम में भाजपा की जीत के साथ मिला मुख्यमंत्री पद :
2021 के विधानसभा चुनावों में भी उन्होंने स्टार प्रचारक के रूप में प्रमुख भूमिका निभाई। शर्मा ने अपनी पारंपरिक जालुकबाड़ी सीट से एक लाख से अधिक मतों के भारी अंतर से जीत दर्ज की। लगातार दूसरी बार भाजपा की सरकार बनने के बाद पार्टी ने सर्वानंद सोनोवाल की जगह उन्हें कमान सौंपी और 10 मई 2021 को वे असम के 15वें मुख्यमंत्री बने। यह पहली बार था जब भाजपा ने किसी अन्य पार्टी से आए नेता को मुख्यमंत्री का पद सौंपा था।

भाजपा के लिए शर्मा की अहमियत कितनी ज्यादा है, इसका अंदाजा सिर्फ इसी बात से लगा सकते हैं कि उनकी भूमिका असम तक सीमित नहीं रही, बल्कि वे राष्ट्रीय स्तर पर दिल्ली आलाकमान और अमित शाह के सबसे भरोसेमंद बनकर उभरे हैं। वे पार्टी के लिए अलग-अलग राज्यों में प्रचार तंत्र से लेकर चुनावी तैयारियों तक की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं।

इसका एक उदाहरण महाराष्ट्र का है। यहां महा विकास अघाड़ी (एमवीए) सरकार को गिराने के दौरान एकनाथ शिंदे गुट के बागी विधायकों को गुवाहाटी के रिसॉर्ट में सुरक्षित ठहराने की पूरी घटना के पीछे सरमा की ही भूमिका मानी जाती है। इसके अलावा पंजाब के खालिस्तानी समर्थक अमृतपाल सिंह के सहयोगियों को असम की डिब्रूगढ़ जेल में रखना हो या विपक्षी नेताओं जैसे- पवन खेड़ा और जिग्नेश मेवाणी पर असम पुलिस की तरफ से तत्काल कार्रवाई करने की बात हो, इन सबमें भाजपा नेतृत्व का शर्मा पर भरोसा झलका है।

कट्टर हिंदुत्व की छवि के साथ एक बार फिर मुख्यमंत्री पद के दावेदार :
कांग्रेस पृष्ठभूमि से होने के बावजूद, शर्मा ने भाजपा में कट्टर हिंदुत्व की राजनीति को पूरी तरह से अपनाया है। 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने इस ओर कई कदम उठाए हैं। मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने गोहत्या विरोधी कानून (मवेशी संरक्षण अधिनियम) पारित किया, राज्य की तरफ से वित्त पोषित मदरसों को सामान्य स्कूलों में बदला और बंगाली मूल के मुसलमानों, जिन्हें ‘मियां’ कहा जाता है के खिलाफ बड़े पैमाने पर बेदखली अभियान चलाए।

इस आक्रामक छवि के समानांतर, उन्होंने स्थानीय जनता के बीच अपनी एक बहुत ही सुलभ छवि गढ़ी है। असम के युवा और महिलाएं उन्हें प्यार से मामा या दादा (बड़े भाई) कहते हैं, जो जनता के बीच जाकर उनके साथ नाचने-गाने और उन्हें सीधे सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाने के लिए जाने जाते हैं। ही सुलभ छवि गढ़ी है। असम के युवा और महिलाएं उन्हें प्यार से मामा या दादा (बड़े भाई) कहते हैं, जो जनता के बीच जाकर उनके साथ नाचने-गाने और उन्हें सीधे सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाने के लिए जाने जाते हैं।

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