श्याम बाबा सिंड्रोम और ईरान युद्ध
प्रमोद तिवाड़ी
14 अप्रैल की प्राइम टाइम में आज तक चैनल पर अंजना ओम कश्यप अपने खास अंदाज में इजरायली खुफिया एजेंसी मोसाद को नकारा और निकम्मा बता रही थीं। बतौर अंजना, ईरान के साथ युद्ध शुरू होने के पहले मोसाद ने अमेरिका को भरोसा दिलाया था कि वह कुछ ही दिनों में ईरान में सत्ता परिवर्तन कर देगा, पर ऐसा आज तक नहीं हुआ है। इसी तर्ज पर युद्ध शुरू होने के पहले दिन से ही भारत के हिंदी चैनल अमेरिका-इजराइल को नकारा और ईरान को तीसमार खां साबित करने पर तुले हुए हैं। जबकि स्थिति इससे बिल्कुल उलट है। भारतीय टीवी चैनलों पर आने वाले रक्षा विशेषज्ञों की बातों को देखकर लगता है कि वे सारे श्याम बाबा सिंड्रोम के शिकार हैं।
श्याम बाबा सिंड्रोम में हारे का सहारा बनने का भाव रहता है। इसमें हारने वाले पक्ष को नैतिक या अनैतिक होने की कोई परवाह किए बिना, सिर्फ इसलिए कि वह कथित तौर पर कमजोर दिख रहा है, उसका साथ दे दिया जाता है। कई बार, या यूं कहें कि प्रायः यह गुमराह करने वाला होता है। 2026 के इस युद्ध में यह सिंड्रोम भारतीय मीडिया और जनता दोनों पर पूरी तरह हावी नजर आया।
28 फरवरी 2026 को ऑपरेशन एपिक फ्यूरी शुरू हुआ। अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर तेज और सटीक हमले किए। शुरुआती बारह घंटों में ही करीब 900 स्ट्राइक्स हुए। इसमें उसके न्यूक्लियर साइट्स, मिसाइल फैक्टरियां और एयर डिफेंस सिस्टम तबाह हो गए। सबसे बड़ा और सबसे कड़वा झटका लीडरशिप को लगा। मोसाद और अमेरिकी खुफिया एजेंसियों की मिली-जुली कार्रवाई में सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई समेत आईजीआरसी चीफ, डिफेंस मिनिस्टर और कई टॉप कमांडर्स मारे गए। मोजतबा खामेनेई जैसे संभावित उत्तराधिकारी भी घायल हुए। यानी ईरानी नेतृत्व की दो पूरी पीढ़ियों को टारगेटेड असैसिनेशन से खत्म कर दिया गया।
ईरान ने जवाब में मिसाइल और ड्रोन दागे, लेकिन ज्यादातर हमले इंटरसेप्ट हो गए। 8 अप्रैल को पाकिस्तान की मध्यस्थता से दो हफ्ते का युद्ध विराम हुआ। बाद में अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों पर नौसैनिक ब्लॉकेड लगा दिया। ईरान का रेजीम अभी टिका है, लेकिन उसकी रीढ़ हिल चुकी है,लीडरशिप और सैन्य क्षमता दोनों को भारी नुकसान पहुंचा है।
फिर भी हिंदी टीवी पर रोजाना “ईरान की बढ़त”, “अमेरिका के हथियार खत्म” और “इजराइल तबाह हो गया” जैसे नरेटिव चल रहे हैं । पैनल पर रिटायर्ड जनरल और कर्नल “अंडरडॉग ईरान” की बहादुरी गा रहे हैं । मोसाद को “नाकाम” बताने वाले एंकर खुद को बहुत समझदार समझ रहे हैं, जबकि मोसाद ने लीडरशिप डिकैपिटेशन में जो हासिल किया, वह किसी से छिपा नहीं था।
दरअसल, ईरान ने प्रोपगैंडा की जंग में बाजी मार ली है। उसने एआई की मदद से तैयार मीम , बढ़ा-चढ़ाकर बनाए वीडियो और पुरानी फुटेज से बखूबी “विक्टिम” कार्ड खेला । “सुपरपावर मजलूम पर टूट पड़ी” वाला रोना रोया गया। भारतीय चैनलों ने इन्हें बिना ज्यादा जांच के चला दिया। और फिर टीआरपी की लड़ाई में “कमजोर की जीत” वाली कहानी अच्छी बिकती है। 20 करोड़ से ज्यादा मुस्लिम आबादी और गाजा के बाद बनी एंटी-इजराइल भावना ने इस भावना को और हवा दी। आम आदमी भी इसी श्याम सिंड्रोम में फंस गया—कमजोर दिख रहा है तो सही होगा, नैतिकता की जांच की क्या जरूरत? यह गुमराह करने वाली भावना खतरनाक है। ईरान की न्यूक्लियर महत्वाकांक्षा, प्रॉक्सी टेरर (हिजबुल्लाह-हमास-हूती ) और आंतरिक दमन को नजरअंदाज कर दिया गया। अमेरिका-इजराइल को आक्रांता और ईरान को प्रतिरोध का नायक बना दिया गया। जबकि मोसाद का असली काम सत्ता परिवर्तन (regime change) नहीं, लीडरशिप को खत्म करना था,जो काफी हद तक हो चुका था।
इस समूचे प्रकरण में हिंदी टीवी का रोल सबसे निराशाजनक रहा। कुछ चैनल जानबूझकर काउंटर नैरेटिव चला रहे थे। रिटायर्ड सैन्य अधिकारी ड्रामेटिक साउंडबाइट देने में लगे थे। बारीक विश्लेषण की जगह सनसनी बिकी। प्रिंट और अंग्रेजी मीडिया में थोड़ा बैलेंस था, लेकिन हिंदी चैनलों पर श्याम सिंड्रोम छाया दिखा। इस दौरान हालात इतने बिगड़ गए सरकार को BARC को टीआरपी फ्रीज करने का आदेश देना पड़ा, जो इसी सनसनीकरण का प्रमाण है।
गौरतलब है कि श्याम सिंड्रोम सिर्फ मीडिया तक नहीं, सोशल मीडिया और आम चर्चाओं तक फैला। “ईरान की जीत” के ट्रेंड चले, जबकि हकीकत में ईरान ने सिर्फ बचाव किया, स्ट्रैटेजिक हार उसकी झोली में थी।
श्याम सिंड्रोम वास्तव में एक गुमराह करने वाली भावनात्मक प्रवृत्ति है, जिसमें कमजोर प्रतीत होने वाले पक्ष को बिना उसके नैतिक आधार या युद्ध के वास्तविक संदर्भ की जांच किए स्वतः नैतिक समर्थन दे दिया जाता है। यह प्रवृत्ति भावुकता को तर्क से ऊपर रखती है और प्रोपगैंडा के लिए उपजाऊ भूमि तैयार करती है। ईरान युद्ध में स्पष्ट रूप से देखा गया कि विक्टिम कार्ड खेलने वाला पक्ष नैतिक दृष्टि से उतना निर्दोष नहीं था, जितना उसे प्रस्तुत किया जा रहा था।
भारत जैसे देश को इस संदर्भ में अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देनी चाहिए। इजरायल भारत के लिए उन्नत रक्षा प्रौद्योगिकी और खुफिया सहयोग का महत्वपूर्ण साझेदार है, वहीं ईरान ऊर्जा सुरक्षा और चाबहार पोर्ट जैसे रणनीतिक हितों से जुड़ा है।
ऐसे में मीडिया और जनता दोनों को प्रोपगैंडा की चकाचौंध से ऊपर उठकर तथ्यों की गहन जांच करनी चाहिए। हेडलाइंस से आगे जाकर बहु-स्रोत आधारित जानकारी का सहारा लेना आवश्यक है। अन्यथा यह गुमराह करने वाली भावना हमें बार-बार वास्तविकता से दूर ले जाएगी। युद्ध न केवल सैन्य मैदान में, बल्कि सूचना और नैरेटिव के क्षेत्र में भी लड़ा जाता है, जहां ईरान ने निसंदेह शुरुआती बढ़त बनाई, किंतु अंततः हकीकत ने उसे पीछे छोड़ दिया। इतना पीछे की अमेरिकी सदर ट्रंप की पाषाण युग वाली बात सच के करीब दिखने लगी है ।


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