श्री श्यामचंद्र कृपालु
विनोद रिंगानिया
श्री श्यामचन्द्र कृपालु मन, हरण भवभय दारुणम्।
नव कंज लोचन कंज मुख, कर कंज पद कंजारुणम्॥
इन पंक्तियों का वाचन करने के पश्चात सी.एम. बाबू ने प्रश्नवाचक दृष्टि से रामसेवक जी की ओर देखा। यह श्याम बाबा पर लिखी कविता है न?
जी सर, उन्हीं पर।
बहुत सुंदर है। लेकिन आपने काफी कठिन शब्दों का प्रयोग किया है। अब से मेरे लिए कोई कविता लिखें तो सरल शब्दों का प्रयोग किया कीजिए। हो सके तो इसी को थोड़ा सरल बना दें। आखिर लगना चाहिए न कि मेरी लिखी हुई है।
अब इसे सरल कैसे बनाएँ?
सी.एम. ने देखा कि रामसेवक जी चिंता में पड़ गए हैं।
ठीक है, ठीक है। नहीं होता है तो कोई बात नहीं।
अब तक चुपचाप सुन रहा राम निवास शर्मा बीच में कूद पड़ा। उसने झट से कागज सी.एम. बाबू के हाथों से झटक लिया। उसने पूरी कविता पढ़ी और कहा – अब इसमें कंजारुणम्, कंज लोचन ये शब्द कौन समझेगा? हँ भई? फिर आपकी कविता पर बांग्ला का बड़ा भारी प्रभाव है। इसमें बांग्ला शब्द नहीं आने चाहिए।
बांग्ला कहां है इसमें भैया?
यह है न दारुणम्। दारुण-दारुण करके तो बंगाली लोग ही बोलते हैं न।
अरे भई यह संस्कृत का शब्द है।
होगा, लेकिन आप हिंदी कविता लिख रहे हैं या संस्कृत कविता। संस्कृत को हमारे जैसे विद्वान लोगों के लिए छोड़ दीजिए तो बेहतर रहेगा। और फिर इतना कौन जानता है आजकल। आप इस शब्द को हटा ही क्यों न देते। इतना क्या लगाव है इस शब्द से। यह शुद्ध हिंदी कविता होनी चाहिए। है कि नहीं सर? शर्मा ने सी.एम. बाबू से हामी भरवाने की कोशिश की।
सी. एम. बाबू बेचारे सोचने लगे, यह कहाँ फँस गया। मुझे तो इतनी बातें मालूम ही नहीं। फिर इस क्रॉसफायर से निकलने के लिए उन्होंने हमेशा वाला नुस्खा अपनाया। ऑफिस में काम करने वाले छोटू को उन्होंने बढ़िया चाय और कलाकंद-समोसा लाने के लिए कहा। जैसा कि हमेशा होता है, चाय और कलाकंद-समोसों का आर्डर होने के बाद दोनों पक्षों के बीच चाय नाश्ता आने तक संघर्ष विराम हो गया। तब तक सी.एम. बाबू को सोचने का वक्त मिल गया। उन्होंने शांति के साथ रामसेवक जी को समझाया, इतनी कठिन कविता लिखने की क्या जरूरत है? इससे आपका समय भी जाया हुआ और लोगों को समझ में भी नहीं आएगी। क्या इस तरह की कोई कविता नहीं लिख सकते, जैसे कि –
हारा नहीं हूं, पर तू ही सहारा है
हारा नहीं हूं, पर तू ही सहारा है
अंधियारों में भी तेरा ही उजियारा है।
वाह, वाह – बहुत खूब। मैं तो कब से कह रहा हूं आपमें प्रतिभा कूट-कूट कर भरी हुई है सर। रामसेवक जी ने यह दिखाने की कोशिश की कि इतनी खुशी उनको उस दिन भी नहीं हुई थी जिस दिन उनकी पत्नी ने लंबे इंतजार के बाद एक बालक को जन्म दिया था।
रामसेवक है कि मुआ बोलना बंद ही नहीं कर रहा, जबकि शर्मा को अपनी बेटी का आज कॉलेज में एडमिशन करवाना है। खास उसी के लिए वह आज सी.एम बाबू के पास आया है। यदि इसी तरह रामसेवक बोलता रहा तो फिर तो हो गया उसकी बेटी का एडमिशन। लेकिन शर्मा जल्दी हार मानने वालों में से नहीं है। उसने मन ही मन राणाप्रताप के साहस को याद किया और अपने दिमाग के एक्सीलेटर पर दबाव बढ़ा दिया, और ये लो – उसमें से एक बहुत ही नायाब चीज निकल कर आ गई। उसने सी.एम. बाबू के सामने इरशाद किया – आगे जोड़ दीजिए सर –
जब-जब डगमगाए मेरे विश्वास के पग,
तेरे नाम ने ही मुझको संभारा है।
वाह क्या बात है। सी.एम. बाबू ने जब दाद दी तो शर्मा को थोड़ा भरोसा हुआ कि उसका काम आज हो जाएगा। रामसेवक को इससे जबरदस्त जलन लगी, उसने समझ लिया कि आज का यह मैच ओलंपिक से भी महत्वपूर्ण है। आज हारने का मतलब है कविता संग्रह का प्रोजेक्ट उसके हाथ से निकल जाना। उसने दिमाग की सारी बत्तियां जला दीं और किसी कोने में पड़ी ये पंक्तियां उसे भी मिल गईं।
जीवन की राहों में कितने ही तूफान आए,
तेरी कृपा ने हर बार उबारा है।
और आगे सुनिए सर,
मैं क्या करूं, बस तेरा ही जप करता रहूं,
तू ही मेरा पथ, तू ही किनारा है।
सी.एम. बाबू का मन प्रसन्न हो गया। उन्होंने कहा कि वह कृपालु भजुमन वाली कविता रहने दें, यही ठीक रहेगी। और उन्होंने कविता संग्रह जल्द से जल्द तैयार करने के लिए कहा, ताकि अगले महीने होने वाले लायंस के अधिवेशन में उसका सचमुच के सी.एम. के हाथों, वो क्या कहते हैं, विमोचन करवाया जा सके।
रामसेवक जी मैच जीत गए थे। शर्मा बेचारा शर्म के मारे अपनी बेटी के एडमिशन वाली बात निकाल ही नहीं पाया। अगली बार कोई और योजना लेकर आने की सोचते हुए वह दुखी मन से सी. एम. बाबू की गद्दी से निकल आया।

